Gita 15.15-16.12 – Purushottama – the highest reality and the qualities that define our natures (Hindi)
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Lecture Summary
यह व्याख्या भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) के अंतिम श्लोकों और सोलहवें अध्याय (दैवीय और आसुरी संपद् विभाग) के शुरुआती श्लोकों पर आधारित है। मुख्य बिंदुओं का सार निम्नलिखित है:
- ईश्वर का पालन और ज्ञान: भगवान इस भौतिक जगत में केवल हमें भौतिक सुख देने के लिए नहीं, बल्कि हमारा मार्गदर्शन करने के लिए पालन करते हैं ताकि हम इस अशाश्वत संसार से परे नित्य धाम को प्राप्त कर सकें।
- स्मृति, विस्मृति और इच्छा: भगवान सबके हृदय में स्थित हैं। हमारी जैसी इच्छा (इंद्रिय तृप्ति या भक्ति) होती है, परमात्मा उसी के अनुसार हमें प्रेरणा, स्मृति या उसकी विस्मृति प्रदान करते हैं। सच्चे वेदों का अंतिम उद्देश्य भगवान को जानना ही है और वेदों के रचयिता स्वयं भगवान (व्यासदेव के रूप में) हैं।
- पुरुषोत्तम योग (15.16-20):
- क्षर पुरुष: नाशवान भौतिक जगत और समस्त जीव।
- अक्षर पुरुष: कूटस्थ ब्रह्म।
- उत्तम पुरुष (पुरुषोत्तम): इन दोनों से परे सर्वोच्च सत्ता स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं, जो संपूर्ण ज्ञान और वेदों का सार हैं। जो इस रहस्य को बिना किसी संशय के जान लेता है, वह सर्ववित् बनकर संपूर्ण भाव से केवल भगवान की भक्ति (भजति माम्) करता है।
- आसुरी प्रकृति और नास्तिक दृष्टिकोण (16.1-12):
- सोलहवें अध्याय के आरंभ में आसुरी स्वभाव वाले लोगों का वर्णन है जो इस जगत को असत्य, बिना ईश्वर (अनिश्वरम्) और केवल काम-वासना से उत्पन्न (कामहेतुकम्) मानते हैं।
- ऐसे लोग इंद्रिय तृप्ति (आहार, निद्रा, भय, मैथुन) को ही जीवन की एकमात्र प्राथमिकता (कामोपभोगपरमा) मान बैठते हैं।
- मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल शारीरिक आवश्यकताएं पूरी करना नहीं, बल्कि उच्च आध्यात्मिक मार्ग को अपनाना है, जबकि आसुरी प्रवृत्ति के लोग अर्थ, काम और भोग को ही सर्वस्व मानकर अंतहीन चिंताओं में फंसे रहते हैं।
Full Transcription
भूमिका और पंद्रहवें अध्याय का परिचय
पंद्रावात्या, पंद्रावश्टो। सर्वस्य चाहं विधिसंदिमिष्टो। मत्तःस्मतिर्ज्ञानमपोहनंचा। वेदहिष्यसर्वेरहमेवविध्यो। वेदान्तकृत्वेदविदेवचाहं।
यहां पे हम देख रहे हैं, तीसरा अलभाग चल रहा है पंद्रावात्या का। इस तीसरे अलभाग में ज्ञान चक्षु कैसे प्राप्त करना है, उसका वर्णन हो रहा है।
तो बारहवें, तेरहवें जड़़ा श्लोक बताये था कि किस तरह से भगवान इस सृष्टि का पालन करते हैं, ब्रह्मांड को चलाते हैं रोशनी देकर, पृथ्वी को धारण करते हैं अपनी ऊर्जा शक्ति के द्वारा, और फिर हमारे चौरिया को चलाते हैं वैश्वानर के रूप में।
तो अभी ये भौतिक जगत का अस्तित्व का उद्देश्य क्या है वास्तव में? इसके लिए जगत का अस्तित्व का उद्देश्य क्या है वास्तव में? मतलब क्या? इस दुनिया का उद्देश्य क्या है? कि दुनिया के परे जो धाम है, वह हमें दिखे। तो भगवान इस दुनिया में हमारा पालन करते हैं इसलिए नहीं कि हम सुख से यहां पे रहे हैं, ऐसे नहीं कि भगवान चाहते हैं कि हम दुखी करें हमेशा।
पर यह जगत अशाश्वत है और इसके परे एक जगत है और वहां पे जाना है, तो वहां जाने के लिए जो मार्ग है वह बताना, उसके लिए मार्गदर्शन करना यह भगवान का प्रधान कार्य है और वह वे परमात्मा के रूप में करते हैं। तो इसलिए भौतिक दृष्टि से पालन करते हैं और आध्यात्मिक दृष्टि से भी ज्ञान देते हैं।
ज्ञान, स्मृति, विस्मृति और वेदों का सार
और वह ज्ञान देने के लिए सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो, सबके हृदय में पास में ही मैं बैठा हूँ, भगवान कहते हैं और मैं क्या करता हूँ? मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
तो स्मृति, ज्ञान और अपोहन का क्या संबंध है? वास्तव में भगवान बाहर से गुरु, साधु, शास्त्र के रूप में ज्ञान देते हैं और फिर हमारी इच्छा के अनुसार, अगर शास्त्र से बताया जाता है कि भगवान की भक्ति में असली आनंद है, इंद्रिय तृप्ति में आनंद नहीं है, तो यह जब सुनते हैं तो उसके बाद में यह ज्ञान हमको भगवान ही दे रहे हैं गुरु, साधु, शास्त्र के मार्फत से।
और उसके बाद में हमारी जो इच्छा है, अगर हम इच्छा रखते हैं कि मुझे इंद्रिय तृप्ति करनी है, तो फिर भगवान हमारी इच्छा को देख कर हमें उस ज्ञान की अपोह मतलब आनंद कर देते हैं। इसको भगवान कभी-कभी हम देखते हैं कि इंद्रिय तृप्ति की प्रलोभन आया था, हमारी इच्छा के लिए, तुम चुनना पड़ेगा। अगर तुम फिर भी इच्छा रखते हो कि इंद्रिय तृप्ति करनी है, तो फिर इंद्रिय तृप्ति के अनुकूल मैं ज्ञान दे दूँगा, इंद्रिय तृप्ति के प्रतिकूल जो ज्ञान है, उसकी विस्मृति कराऊँगा।
और इसके विपरीत अगर हम भगवान की भक्ति की इच्छा करते हैं, तो फिर भले ही इंद्रिय तृप्ति के प्रलोभन भी क्यों ना आ जाए, पर भगवान उस ज्ञान को हमको बराबर भक्ति का ज्ञान दिलाएंगे और फिर वो इंद्रिय तृप्ति को हम भूल जाएंगे।
न मय्यनाप्य जातु कथं चनावृत्ति मुकुंद सेव्यया वेदन संस्मृति न।
तो नारद मुनि बताते हैं व्यासदेव को कि जो जिसने भगवान की भक्ति की है, वो भले ही भवबंधन माया के प्रलोभन में फंस जाए, न मय्यनाप्य जातु कथं चनावृत्ति कथं चनावृत्ति, भले ही वो भवबंधन में फंस जाएगा, फिर भी जिस तरह से भौतिक वादी लोग भौतिक जगत में बंध जाते हैं, मुकुंद सेव्यया वेदन संस्मृति न, मुकुंद सेव्यया जिसने मुकुंद की सेवा की है, वो उस तरह से नहीं पड़ता है माया के बंधन में। क्यों? क्योंकि मुकुंदांघ्री स्वर्गुपां गोभिनं पुनर्विहातुमिच्छे न रसद्ग्रहो जनः।
फिर सुखदेव जी बताते हैं परीक्षित महाराज को कि जो रस का आस्वादन है, वो रस का भूत भूत को लग करता है और वो भूत छोड़ता नहीं है। तो इसलिए भले ही व्यक्ति इंद्रिय तृप्ति करने का प्रयास भी क्यों ना करें, पर उसको इंद्रिय तृप्ति में कुछ रस भी मिलेगा और फिर धीरे-धीरे वो भक्ति में लौट के आ जाएगा।
तो इस प्रकार से भगवान स्मृति और विस्मृति देते हैं हमारी इच्छा के अनुसार। और वही भगवान वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो, सारे वेदों में अध्ययन विषय बताए गए हैं, पर उसका अंतिम उद्देश्य जो है कि वो भगवान ही है।
वेदान्तकृत वेदविदेव चाहं, वेदान्तकृत वो ही वेदों के रचयिता हैं व्यासदेव के रूप में। वेदों के रचयिता व्यासदेव ये भगवान के अवतार है। कहते हैं लिटरेचर इनकार्स्टेशन के लिए महामुनि के लिए अवतार है वेद वेद, क्योंकि मैंने ही वेद लिखे हैं, मैं वेद जानता हूँ। भगवान बढ़ा दे, मुझे कोई स्मृति नहीं हो, सब कुछ प्रत्यक्ष रूप से पता है।
पुरुषोत्तम योग: भगवान का सर्वोच्च स्वरूप
यहां पर अर्जुन को सवाल आता है कि वेद, अगर आपको वेद पता है, तो प्रायः वेदों का क्या सार है, मुझे बताओ। तो अभी सोलह, सत्रह, अठारहवां श्लोक है, इनको हमारे आचार्य बताते हैं कि एक त्रिश्लोकी गीता है, इससे चतुःश्लोकी गीता है। चतुःश्लोकी गीता कहां से कहां तक है? दसवें अध्याय का आठवें से ग्यारहवें श्लोक, यह विशेष करके मायावाद खंडन के लिए, भगवान की भगवत्ता के लिए स्पष्ट करने के लिए भगवती उचित श्लोक है और भगवती स्पष्ट श्लोक है।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।।
द्वाविमौ दो प्रकार के लोग, पुरुष है यहाँ पर, अभी इसका उल्लेख पंद्रहवें-बीसवें योगान किया था, बाईसवें-तेईसवें श्लोक में, पर यहां पर आज पुरुषोत्तम से कर रहे हैं।
क्षरश्चाक्षर एव च, उत्तमाः पुरुषस्त्वन्यः।
उत्तम पुरुष कोई और है, मतलब कूटस्थोऽक्षर उच्यते, यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः।
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।।
यस्मात्क्षरं अतीतोऽहं, अक्षर के मैं परे हूँ। अक्षरादपि चोत्तमः, अक्षरादपि चोत्तमः, अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।
पुरुषोत्तमः इस नाम से है, तो मतलब पिछले श्लोक में पुरुषोत्तमः क्या था, वो कौन है? वो भगवान ही है।
तो अभी चक्रवर्ती पाद समझाते हैं कि इस श्लोकों को हम इस परस्पेक्टिव से समझ सकते हैं कि जो सोलहवां श्लोक है, वो ब्रह्म के बारे में वर्णन कर रहा है, सत्रहवां श्लोक परमात्मा के बारे में वर्णन कर रहा है, और अठारहवां श्लोक जो है, वो हम भगवान के बारे में वर्णन कर रहे हैं। तो इस तरह से ये प्रगतिशील है—ब्रह्म, परमात्मा, भगवान।
सर्वगतम, सर्वगतम, तो क्या है? अभी ब्रह्म में अनुब्रह्म है, परब्रह्म है, दोनों है। पर अहं ब्रह्मास्मी सत्य है, तो इसलिए वो गलत नहीं है। पर जो ब्रह्म है सर्वगतम, सर्वत्र, सर्वंखल्विदं ब्रह्म, आज बहुत श्लोक है, सब कुछ ब्रह्म है। महावाक्य के, वेदांत के उपनिषद लोग हैं, उसमें भी आता है ब्रह्म सर्वगतं ह्येषः, तो वो असत्य नहीं है, पर वो पूर्ण असत्य भी नहीं है।
अभी भगवान बोलेंगे, अभी इन तीन श्लोकों में बताये हैं, अभी इनका जो सार है, वह अगले श्लोक में सार है, जो कैसे अगर विधि समझ जाएगा कोई व्यक्ति की क्या महिमा है, जो समझ जाएगा इन तीन श्लोकी भगवान जो है, उसको समझ जाएगा।
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्ववित् भजति मां सर्वभावेन भारत।।
यो जो इस तरह से असम्मूढ बिना किसी मोह के जानाति पुरुषोत्तमम् समझता है कि हम मैं पुरुषोत्तम हूँ, पुरुषोत्तमं यो ऐसा समझता है, वो भजन करता है क्या का? सर्ववित्, ऐसा समझता है कि सब कुछ जान चुका है।
और ज्ञान के उद्देश्य है, ज्ञान की पराकाष्ठा है, ज्ञान का सार है, वो समझ गया है। स सर्ववित्, और स सर्ववित् पूरा ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद क्या होता है? भजति माम्।
ऐसे नहीं है कि जब सर्ववित् बन गया, तो वो तोछता है कि मैं भगवान श्रृंखलावरी महत्व पूर्ण है, कई बार ज्ञानी होते हैं वो स्वीकार करते हैं कि भक्ति मार्ग अच्छा है, पर वो कहते हैं कि भक्ति के बाद में जब पूर्णता हो जाएगी, तो मुक्ति प्राप्त हो जाएगी। इसे कहते हैं चैतन्य मत, शंकर मत कहते हैं। चैतन्य महाप्रभु का जो मार्ग है बंगाल में कहा, चैतन्य महाप्रभु का मार्ग बड़ा अच्छा है, नाचो-गाओ, मुक्ति करो। पर क्या है? शंकराचार्य ने मत बताया है कि चैतन्य पद शंकर मत मतलब क्या कि शंकराचार्य ने अद्वैतवाद में मुक्ति प्राप्त करनी है।
सर्वभाविव, सर्वभाविव जब हो जाता है, कभी ये नहीं सोचता है कि मैं भगवान हूँ, भजति माम्, भजति माम् वो मेरा भजन करता है। किस तरह से भजन करता है? सर्वभाविव पूरे हृदय के साथ, सब भावना के साथ।
बुधः सर्वभावैः, बुधः सर्वभावैः, बुधः सर्वभावैः समन्विताः। बुधः सर्वभावैः समन्विताः, और अभी फिर भी अगर कोई संदेह नहीं होगी, इसके अलावा और कुछ और इच्छा ज्ञान है, तो अगले श्लोक में अलग स्पष्ट होता है।
गुह्यतम शास्त्र और आसुरी प्रवृत्तिके लोग
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।।
इति गुह्यतमं शास्त्रम् इतमुक्तम् मयानघ, बुद्धिमान् स्याद् द्वेक्ति वास्तम्। बुद्धिमान है वह व्यक्ति वास्तव, बुद्धिमान है, बुद्धिमान करता है।
शृणु भक्ति के बारे में वर्णन होते हैं, तो शृणु बहुत सारे बारे में आते हैं। इसमें दोनों में डिफरेंस है—प्रवक्षामि और शृणु।
प्रवक्षामि मतलब मैं बोल रहा हूँ, शृणु मतलब आप सुन रहे हैं। तो प्रवक्षामि और शृणु प्रवक्षामि मतलब अपरस्परसंभूतम, किमन्यत्कामहेतुकम्।
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगत आहुरीश्वरम्।
अपरस्परसंभूतम् किमन्यत्कामहेतुकम्।।
जो भौतिक जगत है, असत्य है, उसका कोई प्रतिष्ठा ही नहीं है। प्रवक्षामि यहां पे बता रहे हैं कि जो मायावादी का उल्लेख कर रहे हैं, बल्कि दार्शनिक दार्शनिक करते हैं, जो सांख्य दर्शन है, उसमें कई भ्रांत धारणाएं आती हैं।
तो कौन सा इसमें जो धारा, किस धारा, भ्रांत धारणा से समझते हैं? सत्यम अप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। तो जो नास्तिक वाल्सां क्या होता है, वो कहते हैं कोई ईश्वर नहीं है, केवल पुरुष ही प्रकृति है।
अपरस्परसंभूतम, अन्त में सब कुछ काम के बाधा कुछ और है ही नहीं।
एतांदृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः।।
एतांदृष्टिमवष्टभ्य, नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः, प्रभवन्त्युग्रकर्माणः, क्षयाय जगतोऽहिताः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः, प्रभवन्त्युग्रकर्माणः, दम्भमानमदाग्निताः काममासृत्य मोहाद्गृह्णानसद्ग्रहान्।
जैसे कल तंत्रा-तंत्रा में जो व्रत लेते हैं, आर्थी-जीवे करने के व्रत होते हैं, उसका उल्लेख कर रहे हैं। अशुचि व्रत, पूना गंदर में जब वो बन रहा था, तो क्या कि कैसे लोगों को जानकारी दिया इसमें एक पूना गंदर में?
पूना गंदर में जब वो बन रहा था, तो उन्होंने एक दूसरे का सैंतालीस घंटा कंटीन्यूअस चुंबन किया। अभी वास्तव में बहुत ही प्रिस्टिस में देखी गई है, तो क्या है मुंह से समाइवा निकल रहा है, फूल निकल रहा है, उसमें कोई-कोई भोग आनंद्री तलवना हो सकती है, पर वो कितने समय तक होता है? वो क्या सिर्फ रिकॉर्ड के लिए मुंह चिपका के रखने का है? वो क्या है? ओ शुचि व्रत होता है और कुछ है ही नहीं।
तो जब व्यक्ति को क्या सही है, क्या गलत है, वो समझ में नहीं आता है। तो जब व्यक्ति को क्या सही है… तो जब व्यक्ति को क्या सही है…
काम, क्रोध और इंद्रिय तृप्ति का भ्रम
कामक्रोधपरायणा इहं ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयाः।
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयंतामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावद निश्चिताः।।
चिन्ताम् अपरिमेयां हौंच व्यक्ति मृत्युचे वर्जेता है, तो चिंता जाते हैं, अक्षर व्यक्ति अंतर नहीं होता है। प्रलयां तां पाशुता है, चिंता प्रित्यु तक रहती है, उसको चिंता जाते हैं, अंतर नहीं होता है।
अंत मतलब क्या है? अनलिमिटेड, अनएंडिंग एंजायटी, जो संख्या में अगणनीय है और काल तुष्य से मृत्यु तक रहती है, चिंतां प्रलयांतामुपाश्रिताः। और क्यों आता है ये? कामोंभोग परमा, क्या प्रभाजी का बाजा करते हैं कि इंद्रिय तृप्ति ही जीवन का प्राइम नेसेसिटी है, सबसे महत्वपूर्ण जरूरत है, यह इंद्रिय तृप्ति ही है।
तो अभी एक जरूरत है, प्रभाजी का बाजा करते हैं—आहार, निद्रा, भय, मैथुन, यह सब जीवन की जरूरत है, पर वो सबसे महत्वपूर्ण जरूरत नहीं है। वो एक जरूरत है, उसको पूरा करना है और विशेष करके मानव जीवन में आते हैं, तो हमको और भी बहुत कुछ करने का मौका है।
उसको अगर कभी आईआईटी जो है, भारत में महत्वपूर्ण, बहुत विख्यात यूनिवर्सिटी मानते हैं सारे भारत भर में। अलग-अलग विद्यार्थी हैं, अलग-अलग कॉलेजेस में हैं और सब में वो पढ़ाई कर रहे हैं और जहां भी विद्यार्थी रहते हैं, उनको कुछ रहने के लिए चाहिए, उसके लिए मेस होता है, उसके लिए कैंटीन होता है।
तो आईआईटी में जाते हैं, वहां पर भी खाने के लिए व्यवस्था होती है। पर अगर कोई सोचता है कि मैं आईआईटी में जाऊंगा और मेरा उद्देश्य क्या है? स्वादिष्ट अन्न कहां मिलेगा और सारा दिन भर वही घूमते बैठते हैं, तो फिर ये क्या है? ये मूर्खता है। वो से पढ़ना ही चुनना था, तो आईआईटी जाने के लिए क्या चुननी है, वो कहीं और से भी प्राप्त कर सकते हैं।
आईआईटी में जा रहे हैं, वो वहां पे और कुछ ऊंचा कर सकते हैं। आहार, निद्रा, मैथुन जो हैं, वो एक जरूरत है, पर वो जरूरत तो सब योनियों में हैं और उसको पूरा करना महत्वपूर्ण नहीं है, तो सब योनि पूरा कर सकते हैं। पर अगर हम आध्यात्मिक मार्ग में लगे रहे हैं, आपको मानव शरीर मिला है, कामोपभोग परमा यह गलत है।
काम यह एक धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में एक अंग है उसका, पर कामोपभोग परमा इसको ही अगर सर्वश्रेष्ठ बना लेते हैं, तो फिर बहुत गलत है।
हम देखते हैं कि रामायण में जब विश्वामित्र मुनि दशरथ महाराज से मिलने आते हैं, तो दशरथ महाराज से पूछते हैं कि आपका पुनर्जन्म पे विजय कैसे, कैसे बढ़ती हो रही है? तो क्या है? संन्यासी को सवाल पूछते हैं कि आपका पुनर्जन्म पे विजय कैसे हो रहा है?
महाभारत में हम देखते हैं कि जब विश्वामित्र मुनि दशरथ महाराज से मिलने आते हैं, तो दशरथ महाराज से पूछते हैं कि क्या आप धर्म, अर्थ और काम में समन्वय रख रहे हो? क्या बहुत व्यक्ति जो धर्म के लिए अर्थ और काम का त्याग कर दें या अर्थ के लिए धर्म और काम का त्याग कर दें या काम के लिए धर्म और काम का त्याग कर दें? बहुत व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में सुखी नहीं रह सकता है। गृहस्थ आश्रम में तीनों का समन्वय रखना चाहिए।
पर यहां पर क्या कर रहे हैं? कामोपभोग परमा, उसको ही सबसे पूरा नहीं है, तो वो गलत है। अर्था वर्ति निश्चितः, निश्चितः, वो सोचते हैं कि इसके अलावा कुछ है नहीं है, यही सब कुछ है।