Gita 16.13-17.06 – Demoniac mentality in today’s society (Hindi)
Disclaimer: This transcript was generated using AI and may contain occasional errors or inaccuracies.
Lecture Summary
यह अध्याय दैवी (daivi) और आसुरी (asuri) स्वभावों के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है:
- दिव्य और आसुरी गुण: पहले तीन श्लोक दैवी गुणों का वर्णन करते हैं, चौथे और पाँचवें श्लोक में दोनों का सार बताया गया है, और सातवें से चौबीसवें श्लोक तक आसुरी गुणों, उनके परिणामों और उनसे बचने के उपायों का विस्तार से वर्णन है।
- भौतिकवादी और नास्तिक दृष्टिकोण: नास्तिक भगवान को नहीं मानते, जबकि भौतिकवादी भौतिक भोग को ही जीवन का मुख्य उद्देश्य मानते हैं। भौतिकवाद “धार्मिक भौतिकवाद” (religious materialism) भी हो सकता है, जहाँ व्यक्ति भोग तो करना चाहता है लेकिन धार्मिक नियमों या कर्मकांडों के अनुसार।
- धन और नियंत्रक की भावना: धन वह माध्यम है जिसके जरिए जीव इस दुनिया में नियंत्रक (controller) बनने का प्रयास करता है। यद्यपि वैदिक संस्कृति में अर्थ (धन) एक पुरुषार्थ है, लेकिन वह धर्म के अनुकूल होना चाहिए।
- काम, क्रोध और लोभ: लालच, काम और अहंकार के कारण असुर अपने प्रतिस्पर्धियों को समाप्त करना चाहते हैं और दंभ, पाखंड व यश प्राप्ति के लिए दिखावे के यज्ञ और दान करते हैं।
- मोह का जाल और नरक: काम, क्रोध और लोभ—ये नरक के तीन मुख्य द्वार हैं जो व्यक्ति को मोह के जाल में फँसाते हैं। नरक का उद्देश्य शाश्वत दंड देना नहीं, बल्कि जीव की चेतना को सुधारना और उसे भौतिक दुखों से मुक्त करना है।
- शास्त्रों की प्रामाणिकता: अपनी मर्जी या सनक पर चलने के बजाय शास्त्रों के निर्देशों (tasmach chhastram pramanam te) के अनुसार जीवन जीना ही सच्ची सिद्धि, सुख और परम गति को प्राप्त कराता है।
- श्रद्धा के तीन प्रकार: मनुष्य की श्रद्धा उसकी प्रकृति के अनुसार सत्व, रज और तम—इन तीनों गुणों से प्रभावित होती है, जो उसके चयन, पूजा और कार्यों में झलकती है।
Full Transcription
भगवद्गीता – अध्याय 16: दैवी और आसुरी स्वभाव
हरे कृष्णा! हम सोलहवें अध्याय के बीच में थे। बारहवें श्लोक तक हमने पूरा किया था। सोलहवें अध्याय की जब मैंने शुरुआत की तो मैंने यह बताया नहीं था कि इसका विश्लेषण कैसे है। पहले तीन श्लोक जो हैं, वे दैवी गुणों के बारे में बताते हैं। फिर चौथे और पाँचवें श्लोक में उसका सार बताया गया है दैव और असुर गुणों के बारे में। और फिर सातवें श्लोक से चौबीसवें श्लोक तक आसुरी गुणों के बारे में बताया गया है। आसुरी गुण, फिर उसका परिणाम क्या होता है और आसुरी गुणों से कैसे बचना है—इस सबका वर्णन आता है।
तो अभी हम देख रहे थे कि कैसे यह जो व्यक्ति भौतिकवादी होते हैं, नास्तिकवादी होते हैं, तो उसमें क्या होता है—
इदम अध्यमया लब्धम इदम प्राप्ये मनोरथम्
इदम अस्तीदम पिमे भविष्यति पुनर्धनम्
“इतना पैसा कमा लिया है, और मेरे मन की योजना से मैं और भी प्राप्त कर लूँगा।”
यहाँ पर क्या भाव है? जब व्यक्ति भौतिकवादी बनता है, तो अभी भौतिकवाद और नास्तिकवाद एक नहीं हैं। इसमें फर्क क्या है? नास्तिकवाद का मतलब क्या होता है जो भगवान को नहीं मानते। भौतिकवादी का मतलब क्या होता है जब भौतिक भोग को जीवन का उद्देश्य मानते हैं। तो कुछ भौतिकवादी लोग नास्तिकवादी भी हो सकते हैं, पर भौतिकवाद आस्तिक भौतिकवादी भी हो सकता है—religious materialism यानी धार्मिक भौतिकवाद हो सकता है।
मतलब क्या? भौतिक भोग ही करना चाहते हैं, पर सोचते हैं कि हम धर्म के अनुसार जिएँगे तो भोग करेंगे। जैसे कुछ लोग होते हैं जो कर्मकांड करते हैं, तो वे भौतिकवादी हैं। भौतिक भोग करना चाहते हैं, पर वह धर्म के नियमों के अनुसार होता है। जो असुर होते हैं, वे धर्म के नियमों के अनुसार करना चाहते हैं—”इदम अस्तीदम अपीमे, इतना धर्म मैंने प्राप्त किया है और मैं प्राप्त करूँगा।” और इस तरह से लोग होते हैं।
धन और नियंत्रक बनने की मानसिकता
व्यक्ति में वह जो मोह है, वह व्यक्ति को एक तरह से पागल बना देता है। क्या होता है? काम, क्रोध, लोभ—इसमें से क्या होता है? यह सब भगवान आगे बताएंगे। तीनों जो हैं अनर्थ हैं जो व्यक्ति को बंधन में फँसाते हैं। पर भौतिकवाद जो है, उसमें दो विभाग हैं। प्रभुपाद जी अक्सर लेक्चरों में बोलते हैं कि भगवद्गीता में आता है—ईश्वरोऽहम अहं भोगी।
तो पैसा क्या करता है? हम जानते हैं आठवें स्कंध में जो अघ्भूर ब्राह्मण की कहानी है, उसमें धन का जो परिणाम है, उसके बारे में अघ्भूर बताते हैं। धन क्या होता है? Money is the medium by which we try to become controllers. हमको नियंत्रक बनना है। नियंत्रक कैसे बनेंगे? पैसा है तो लोग मेरे आदेश का पालन करेंगे। पैसा है तो जो चाहें खरीद सकता हूँ, भोग कर सकता हूँ। तो जीवात्मा को नियंत्रक बनना है, उसके लिए पैसा महत्त्वपूर्ण है। तो सोचता है कि मैं और पैसा प्राप्त करूँगा।
और फिर अर्थ, यह भी एक वैदिक संस्कृति में चार पुरुषार्थों में एक है। पर जो अर्थ है, वह धर्म के अनुसार होना चाहिए। और अभी क्या होता है? ये जब लोग आ जाते हैं, तो वह होता है—
असौ मया हतः शत्रुर हनिष्ये चापरानपि
ईश्वरोऽहम अहम् भोगी सिद्धोऽहं बलवानसुखी
इस तरह से मैंने मेरे शत्रु का वध कर दिया, और दूसरे जो शत्रु हैं, उनका भी मैं वध करूँगा। मानसिकता को उड़ा दूँगा। हम कहते हैं काम से हिंसा आती है, काम से क्रोध आता है। पर क्रोध से भी हिंसा आती है, लोभ से भी हिंसा आती है। जब लोभ होता है, तो व्यक्ति सोचता है कि अभी मुझे यह चाहिए, जो इसके बीच में आएगा उसको मैं उड़ा दूँगा—हनिष्ये चापरानपि। और इस तरह से सबको निकाल दे।
फिर क्या होता है उसके बाद? “मैं ईश्वरोऽहम, अहम् भोगी।” इस तरह से मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगी बन गया हूँ। हम सब एक तरह से भगवान बनना चाहते हैं। हम सब भोक्ता बनना चाहते हैं, और भोक्ता बनने के लिए हम क्या कर रहे हैं? जो भी हमारे प्रतिद्वंदी हैं, प्रतिस्पर्धी हैं, उनको निकाल देना चाहते हैं।
आढ्योऽभिजनवानस्मी कोऽन्यस्ति सदृशो मया
यक्षे दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः
“आढ्योऽभिजनवानस्मी”—और मैं हूँ महान और मेरे साथ भी बड़े-बड़े लोग हैं। क्या होता है कि हाँ, दे आर सेम पीपल, हू आर हैप्पी विद् देयर ऑन कंपनी। मुझे बताना लगे क्या रहने दो, वो बड़ा है तो सबको पता है। “कोऽन्यस्ति सदृशो मया”—जो असुर लोगों का भाव होता है, जो भगवान का पद है, असूर्ध्व है, उनके समान नहीं है, उनसे बड़ा कोई नहीं है। तो वैसे इनको सोचने थे—कौन्यो सिसतुष्यो मया।
और फिर—”यक्षे दास्यामि मोदिष्याम”—तो मैं यज्ञ करूँगा, मैं दान दूँगा, और फिर मोदिष्याम, मैं भोग करूँगा। यहाँ भाव क्या है? भले यह दान दे रहा है, तो दान देने का भाव यह नहीं है कि किसी का कल्याण हो। वह सोचता है कि मैं दान दूँगा तो मेरे नाम, मेरी ख्याति बढ़ेगी। तो इसलिए कई बार लोग यह दान देते हैं और सोचते हैं कि मैंने यह दान दिया है, मैंने यह दान दिया है।
तो अभी यहाँ व्यवस्था में, कभी-कभी हमारे मंदिरों में भी ऐसे लिखते हैं कि किस व्यक्ति ने यह दान दिया है, उस व्यक्ति ने दान दिया है। तो वह क्या है? कि इसमें दो भाव हैं। एक है कि जो व्यक्ति दे रहा है, जैसे मंदिर में अगर कोई स्पॉन्सर भी देता है तो उसका नाम अनाउंस करते हैं, तो उसको भेंट देते हैं, तो उसमें भाव क्या है? कार्य उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना उसके पीछे जो भाव है। तो यह जब कोई हमें, जब कोई व्यक्ति कोई सेवा करता है विशेषों के, तो उसकी सराहना करना यह एक स्वाभाविक मानवीय संस्कृति का लक्षण है। पर उसका प्रभाव उस व्यक्ति में क्या होगा और उसका करने का उद्देश्य क्या है, वह महत्त्वपूर्ण है।
मतलब कि वह व्यक्ति करने की इच्छा क्यों करता है? अपनी शुद्धि के लिए, दूसरों के कल्याण के लिए, खुद के नाम की पब्लिसिटी बढ़ाने के लिए? जिसे हम पहले उतार रहते हैं कि हमें उतार रहते हैं, पर हमें उतार रहते नहीं चाहते हैं। तो यहाँ पर क्या है जो अपेक्षा होती है मान, तो वह वास्तव में आसुरी भाव है—इत्यज्ञानविमोहिताः। इसलिए बड़े अज्ञान में फँसा हुआ है और अज्ञान के कारण ऐसी-ऐसी भावनाएँ उसमें आ गई हैं।
मोह जाल और काम-भोग
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ
इस तरह से अनेक पद्धति से उसका चित्त जो है विभ्रांत हो गया है—ये करना है, वो करना है, वो करना है। इस तरह से भाव आता है—अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। पूरी तरह से मोह से व्यक्ति आवृत्त हो गया है।
अभी जाल, हम शब्द जानते हैं, मछली को पकड़ने के लिए जाल होता है। इस प्रकार के जाल होते हैं, तो जाल में व्यक्ति फँस जाता है। तो क्या होता है? कभी कोई जाल होते हैं, उसमें दिखता नहीं, फँस गया है, व्यक्ति फँस गया होता है। तो उसी तरह से मोहजालसमावृताः। जैसे अभी काँच भी अलग-अलग प्रकार के होते हैं। कुछ काँच ऐसे होते हैं जिसमें अंदर क्या है दिखता नहीं, कुछ भी दिखता नहीं। इधर से भी बाहर नहीं देखते हैं, बाहर से भी अंदर नहीं देखते हैं। कुछ काँच ऐसे होते हैं कि एक जगह से हम दूसरे जगह देख सकते हैं, हम अंदर से बाहर देख सकते हैं पर बाहर से अंदर नहीं देखते हैं। कई बार कुछ काँच को ऐसे काँच होते हैं, काँच होते हैं कि दोनों देख सकते हैं, तो उसको कहते हैं—इम्प्रूव्ड ट्रांसपेरेंट, ट्रांसलूसेंट और ओपेक। हिंदी में शब्द पता नहीं मुझे इसके लिए, पारदर्शी जो होता है, फिर जो बिल्कुल कुछ अपारदर्शी है, आप समझ गए हैं क्या होता है, उदाहरण।
तो इस प्रकार से क्या होता है? ये काँच होती है, शब्दों का संधि करके कोई भी शब्द बना सकते हैं अच्छी बात, उससे हम देख नहीं सकते। हम बाहर हैं, हम देख नहीं सकते भगवान को, पर भगवान सबको देख सकते हैं। पर यह ऐसा जाल है—अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। यह ऐसा जाल है कि सब लोग इसमें फँस जाते हैं, उनको लगता ही नहीं हम फँसे हैं।
तो अभी पहले भगवान ने कहा था इसमें दो उधार नहीं था, पहले आशा पाश से देर बद्ध था, अभी मोहजाल समावृता तो इसमें फर्क क्या है? पाश मतलब रस्सियाँ हैं, जाल मतलब क्या है? क्या होता है, कभी लोग सवाल पूछते हैं, तो क्या होता है वो समझते हैं कि कृष्ण ने ऐसे रास्ते लाग क्यों कि वो बोले कि कृष्ण भगवान है, पर भगवान का अस्तित्व है क्या भी अच्छा एक रास्ता लाग क्या है? तो सवाल पूछते हैं, और दूसरा भगवान का अस्तित्व है कि क्या सवाल पूछते हैं? तो क्या है लोगों का इतना मोह होता है कि वो एक-एक करके सवाल का जाल निकालना होता है, इतने जगह फँसे होते हैं कि उसको निकलना बड़ा मुश्किल होता है। तो इसलिए मोह जाल समावृता है।
एक-एक आशा जो है वो एक रस्सी के समान है, और उसके अलावा बिऑंड आवर डिजायर्स, अवर मिसलीडिंग डिजायर्स, पूरा एक जीवन की धारणा है और जीवन का what is your world view? दृष्टिकोण। दृष्टिकोण इस पर्सपेक्टिव, विश्व दृष्टि। दृष्टि शायद हिंदी में कोई शब्द इस्तेमाल नहीं करते होंगे, तो दुनिया को देखने की जो दृष्टि है, वो जो होती है ऐसे होती है कि वो विधि को उससे निकलना बड़ा मुश्किल होता है। तो इसलिए अनेकचित्तभ्रान्ता मोहजालसमावृताः—तो इस मोह के जाल में कामभोग की इच्छा से व्यक्ति फँस गया होता है, और पतन्ति नरकेऽशुचौ, और वो नरक की ओर ले जाता है। नरक की ओर ले जाता है क्यों? क्योंकि क्या है, भोग करता है और अनैतिक पद्धति से भोग करता है।
दम्भ और अहंकार से युक्त पूजा
आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्
कई बार आज संस्कृति में ऐसे होता है ना कि अनुष्ठान में भी ये करते हैं, यज्ञ करते हैं, लोग यज्ञ करते हैं। कई बार ऐसे होता है कि आप लोग कीर्तन करना है, कीर्तन करने के लिए आज हैं तो लोग आते नहीं हैं। यज्ञ हैं, वो लोग तो यज्ञ करते हैं, यज्ञ करते हैं, कुछ स्पेशल लगता है यज्ञ होने वाला है, यहाँ आ गए हैं।
तो लोगों को धर्म जब करते हैं, तो वो दिखावे के लिए होता है। बहुत, अभी जो गणेशोत्सव होती है, महाराष्ट्र में बहुत प्रसिद्ध होती है, और कई बार लोग गणेश की मूर्तियाँ बनाते हैं, मूर्तियाँ बनाते हैं, तो क्या होता है? वो जो पंडाल बनाते हैं गणेश का, उसमें स्पर्धा होती है कि मेरे गणेश की मूर्ति आपकी मूर्ति से बड़ी है, और फिर मेरी और बड़ी है। तो ऐसे इसमें क्या होता है, वो बड़े-बड़े मूर्तियाँ बनाते हैं और फिर उसका पूजा करना भी बड़ा मुश्किल होता है। इसका पूजा क्या करेंगे? और फिर एक हफ्ता हो गया तो क्या होता है?
विग्रहों की पूजा जो होती है, दो पद्धतियों से होती है। एक है नित्य पूजा और एक है नैमित्तिक पूजा। तो नैमित्तिक पूजा जो होती है, उसमें हम जो विग्रहों को कुछ समय के लिए बुला सकते हैं और वो कुछ काल, जब अगर वो व्यक्ति हमेशा के लिए मंदिर बना के पूजा नहीं कर सकता है, तो उसको कहते हैं आवाहन और तिरोभाव। आवाहन मतलब वो भगवान को आमंत्रण देते हैं, कृपया आप इसमें आ जाओ और इसमें आप वास करो, हम आपकी सेवा करेंगे। और तिरोभाव मतलब वो भगवान को कहते हैं, या उसको तिरोभाव आवाहन कहते हैं कि आप अभी आप हमारे घर में आए थे, धन्यवाद देते हैं और भगवान को विदा करते हैं, और फिर जो विग्रह है उसको पानी में डाल देते हैं।
तो यह भी एक, पर यह भी एक उचित विधि है। पर क्या होता है? अभी ये लोग अपना अहंकार दिखा रहे हैं, कि इतना बड़ा-बड़ा विग्रह बनाते हैं। और विग्रह जो बनाते हैं, तो फिर उसको विसर्जन भी करना है। अभी एक घर के इतना बड़ा विग्रह है, उसको पानी में भी डालना है, तो वो भी समस्या आ जाती है। वो कभी तैरेगा, कभी वो कभी ड्राउंड नहीं होगा, वो कभी विसर्जन नहीं हो जाएगा। तो क्या करते हैं? जो विग्रहों को अभी-अभी पूजा है, वो लेके आते हैं, लोगों को शायद अपने कन्धे में लेके आते हैं, गाड़ी में लेके आते हैं, नाचते हैं और फिर जब वो नदी में डालते हैं, तो वहीं पे क्या होता है? वो लोगों को सरकार से नियम होता है कि ये तैरते रहे, तो क्या करते हैं? उसी विग्रहों को पानी में डाल दिया और वहाँ पे वो क्रेन लाते हैं और क्रेन से वो लोग “गणपति बाप्पा मोरया” बोल रहे हैं, उसके सामने गणपति का विग्रह जो है उसका हाथ तोड़ते हैं, उसका पैर तोड़ते हैं, उसका सिर कुचलते हैं और उसको पूरा पावर हाउस होने के बाद पुच्या वर्षी लोग कर जाएँ।
तो ये क्या है? जो नास्तिकवादी लोगों को बोलते हैं कि ये क्या बकवास है, इसके सामने आप झुक रहे हैं, पूज रहे हैं और उसको तोड़ रहे हैं। तो क्या है? जब ये अभी इसमें विसर्जन जो होता है, तो साधारणतया बड़े विग्रहों का विसर्जन नहीं करते हैं। छोटे विग्रह होते हैं, जो व्यक्ति कुछ समय के लिए करना चाहते हैं, विसर्जन के लिए विग्रह होते हैं, जिसे छोटे कुछ होते हैं। तो पर ये बड़े-बड़े क्यों बनाए जाते हैं लोग? क्योंकि वो अहंकार है। मैं इतना बड़ा विग्रह बनाता हूँ, मेरा गणपति जो है वो पच्चीस फीट का है, तुम्हारा गणपति चौबीस फीट का है सिर्फ। तो ये कॉम्पिटिशन होते रहता है। तो ऐसी स्पर्धा जो है, उसमें पूजा वास्तव में भक्ति का भाव, पूजा का भाव कितना है? यजन्ते नामयज्ञैस्ते—इसके लिए, इसके लिए नाम के लिए क्यों कर रहे हैं? और इसलिए दम्भेनाविधिपूर्वकम्—विधि भी नहीं होती है इसमें।
तो वो क्या है कीर्तन करते हैं, जो मारुति स्तोत्र में वो कहते हैं, “तुम तो हो बाल ब्रह्मचारी, मुझे देदो एक नारी।” कई बार ऐसे गणेश की पूजा होती है, तो उसमें वो क्या करते हैं? फिल्मों के गाने लगा रहे हैं, गणेश की पूजा चल रही है और आप फिल्मों के गाने लगा रहे हैं! फिल्मों में गणेश के गाने लगा नहीं रहे हैं, फिल्मों के बहुत प्रेम के बहुत ही गीत हो, तो मैं बोला क्या है, ये गणेश भक्तवत्सल हैं। तो मैं बोला क्या है, ये गणेश भक्त… जो उनके भक्तों को पसंद नहीं करता है, वो उनको भी पसंद नहीं करता है। अभी भक्त आज से लेकिन एक नया-नया परिभाषा कर लेगा—दम्भेनाविधिपूर्वकम्, तो अविधिपूर्वक सब कुछ करते हैं।
अहंकार, काम और क्रोध का आश्रय
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः
अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध—इन सब का आश्रय ग्रहण करना। भगवान नारायण का आश्रय ग्रहण करना है, पर यहाँ पे वे इन सब का आश्रय ग्रहण करते हैं। संश्रिताः—श्रित या आश्रित, वो सब एक ही मूल से आता है—संश्रिताः, व्यपाश्रिताः, आश्रिताः।
तो यह क्या कर रहे हैं? ऐसे गुणों का आश्रय ग्रहण कर लेते हैं। आश्रय ग्रहण करने का मतलब क्या है यहाँ पे? कि जबी हमें इन दुनिया में ऐसे बारिश में लगती है, गर्मी में लगती है, तो हम क्या करते हैं एक छाते का आश्रय ग्रहण कर लेते हैं, तो उससे राहत प्राप्त करने की जो सुविधा होती है, कोई भी चीज़ जो राहत दिलाती है, जो संरक्षण प्रदान करती है, उसको हम आश्रय कहते हैं।
तो कोई काम का आश्रय ग्रहण कर सकता है, उसका मतलब क्या है कि जो व्यक्ति सोचते हैं कि जब भी कोई समस्या आ रहा है, कोई समस्या आ रहा नहीं है कि सेक्स नहीं करता है, तो अब हम सबको देखना है कि मेरा आश्रय क्या है? वास्तव में क्या जप करना है, भक्तों का संग करना है, शास्त्रों का अध्ययन करना है, या फिर इंद्रिय भोग करना है? तो हम सबका आश्रय अलग लोग से हो सकता है। अब बाह्य रूप से हमने ब्रह्मचारी बन गया है, भगवान का आश्रय लिया है, पर अंतरंग रूप से हमारा क्या आश्रय है? हम सबको देखना है हमारा जो आश्रय है, वह भाँति-भाँति द्वारा आश्रय होता है। वह अच्छा आश्रय होता है, वह आश्रय होता है जो वास्तव में कुछ सुझाव मेरे लिए आश्रय प्रदान करता है, पर बाद में और समस्या यह प्रदान करता है। तो आश्रय था, इस तरह से लोग सोचते हैं कि जो भी समस्या है मैं कुछ मेरे खिलाफ आ गया था, तो मैं क्रोध करता हूँ, चिल्लाता हूँ, वो तो चुप जाए तो मैं क्रोध का आश्रय ग्रहण कर रहा हूँ।
तो मामात्मपरदेहेषु—और व्यक्ति इस तरह से आश्रय ग्रहण करते हैं, तो क्या कर रहे हैं वे? वो वास्तव में भगवान की ईर्ष्या कर रहे हैं—प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः। भगवान कहते हैं, “मैं उनके और दूसरों के देहों में हूँ, तो उन सबको हिंसा कर रहे हैं, उन सबके प्रति वो अभ्यसूयकाः प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः।” वास्तव में दोनों का भाव एक ही है, दोनों का जो दर्जा है वो अलग है कि प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः। अंतरंग भाव जो होता है द्वेष होता है, अभ्यसूयकाः मतलब बाह्य रूप से कार्य करना। तो दोनों हैं वो ऐसे डिवोशनल सर्विस हम कहते हैं, तो क्या होता है उसमें डिवोशन इज़ इंटरनल सर्विस इज़ एक्सटर्नल। तो दोनों हैं, अंतरंग रूप से, बाह्य रूप से प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः, क्योंकि दोनों का भाव एक तरह से ईर्ष्या ही है, पर अंतरंग रूप से और बाह्य रूप से इसमें फर्क है।
तो—तानहं द्विषतः क्रूरान्। क्रूर हैं, द्विषती हैं, विद्वेषी हैं, संसारेशु नराधमान्। नराधमाः—यह शब्द कहा है इसके पहले—न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। भागवत में आता है पुरुषार्धमाः, विवेक खर महाराज, किंतु ना करते इस लोग में भगवान पुरुषोत्तम है और जो भोगी बनना चाहता है, उसको पुरुषार्धमाः, नराधमाः—नरों में जो नीचा है। क्यों नीचा है? क्योंकि भगवान से ईर्ष्या कर रहा है।
तो ऐसे होते हैं—क्षिपाम्यजस्रमशुभान्। क्षिपामि मतलब भगवान कहते हैं “मैं फेंकता हूँ अजस्रमशुभान, लंबे समय के लिए आसुरीष्वेव योनिषु।” आसुरी योनियों में फेंकता हूँ।
अब यहाँ पर अगर कोई लगेगा कि यह भगवान क्या व्यक्तियों को जानबूझ के, दूसरों के भगवान परेशान, भगवान सजा देते हैं कि आप ऐसा करोगे तो ऐसे हो जाएगा, ऐसे हो जाएगा, मैं फेंकता हूँ को नरक में फेंकता हूँ, मैं आसुरी योनि में वो फेंकता हूँ? तो क्या है, अगर आप देखेंगे तो भगवान प्रभुपाद जी जो है इसका क्रूरान, क्रूरान का ट्रांसलेशन करता है mischievous। Mischievous मतलब शैतानी नहीं, नटखट जो करता है। तो अभी क्रूर का समानार्थी आता है, क्या होता है? क्रूर का अर्थ नटखटी नहीं होता है, तो प्रभुपाद आप ऐसे भाषांतर क्यों कर रहे हैं? और फिर अगला श्लोक में देखेंगे तो क्या है, ऐसा लगता है कि वास्तव में भगवान कहते हैं ऐसा व्यक्ति मुझे प्राप्त ही नहीं करेगा। तो यह क्रूरान का भाषांतर से क्यों आया है, उसका हम अगला श्लोक कारण देखेंगे, चर्चा करते हैं।
आसुरी योनि और नरक का उद्देश्य
आसुरी योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यात्यधमां गतिम्
आसुरी योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि। जन्मनि… ततो यात्यधमां गतिम्। जन्मनि रक्षक के लिए प्रोटेक्ट हो जाता है, सेवियर है, आप समझें जो हमें बचाने वाला बोल सकते हैं। तो आप स्वीकार नहीं करोगे तो आप नर्क में जाओगे, हमेशा के लिए एक जन्म में हैं, महत्वास। तो क्या होता है, इसको कहते हैं इटरनल, हमेशा के लिए आप नर्क के लिए जाओगे। और नर्क के लिए से वर्णन आता है कि आप नर्क में जलते रहोगे हमेशा के लिए।
तो अभी यह वैदिक शास्त्र का सिद्धांत नहीं है। साधारणतया पिता भी अपने पुत्रों को कई मौके देता है, तो भगवान क्यों नहीं देंगे? भगवान भी देंगे मौके, अनेक मौके देंगे। यहाँ पर जो बताया जा रहा है, यहाँ पर यह श्लोक ऐसे बता रहा है, यहाँ पर भाव बताया जा रहा है—अगर कोई लड़का, कोई पुत्र है और वो ऐसा कुछ कार्य कर रहा है जिससे उससे बहुत परेशानी होने वाली होगा, तो उसके पिता क्या कहते हैं? “अगर तुम ऐसा करोगे तो मेरे घर में कभी वापस मत आना।” तो वो कहने का भाव क्या है कि मेरे घर में कभी वापस आना वो जोर नहीं है, इसका भाव क्या है कि तुम ऐसे मत करो। पर ठीक उस तरह से यहाँ पर भाव क्या है कि ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए, वो है भाव।
आत्मा अविनाशी है और आत्मा किसी भी स्थिति में है, वो उनकी भक्ति करके उद्धार हो सकता है उसका। इसलिए यह सत्य नहीं है कि हम हमेशा हाँ कि नरक हो जाएगी। प्रभुपाद जी को पूछा गया था कि इस हेल इटरनल, क्या नरक यह शाश्वत है? तो प्रभुपाद जी बताया कि नथिंग एक्सेप्ट एक्साइटिक डिवोशनल सर्विस टू कृष्णा इज इटरनल। एक ही शाश्वत है, क्या है वो? भगवान की भक्ति। उसके अलावा और कोई भी चीज़ शाश्वत नहीं है।
तो इस तरह से नरक का उपदेश यह नहीं है कि हमें दुख देना। नरक का उपदेश है कि हमें परिवर्तित करना, हमारी विचार परिवर्तित करके हमें भगवत धाम ले जाना, उसका उपदेश है। तो नरक भी है कि यह एक क्लासरूम के समान ही है। पूरा भौतिक जगत क्लासरूम ही है और नरक भी उसमें क्लासरूम है और कठिन क्लासरूम है, पर वो क्लासरूम ही है क्योंकि वो शाश्वत नहीं है। वहाँ पर जाएँगे तो नरक का उपदेश यह नहीं है कि हमें दुख देना, वास्तव में जब तक हम भौतिक जगत में हैं, तब तक हम दुख भोगने वाले हैं। पर जब नरक में यहाँ से दुख मिलता है, उससे जगत दुखाले समझ में आता है, तो उससे हम उससे छूटने का प्रयास करते हैं। उससे क्या होता है? नरक का उपदेश क्या है? भौतिक जगत में दुख मिलता है, उन दुखों से हमें छुड़ाना है, उनका साक्षात्कार करके हमें उससे छुड़ाने के लिए प्रयास करना है।
तो अब नरक में ऐसे व्यक्ति कैसे जाएगा?
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्
ये तीन प्रकार के नरक है, उसमें तीन द्वार हैं—काम, क्रोध, लोभ। तो वास्तव में जो काम होता है, उसकी पूर्ति होती है तो उससे लोभ बन जाता है। काम की पूर्ति नहीं होती है तो वो क्रोध बन जाता है। जैसे एक पुरुष होता है, वो स्त्री को आकर्षित करना चाहता है, अगर उससे आकर्षित नहीं होती है उससे तो फिर वो क्रोध में आ जाता है। पुरुष क्या कर देगा उससे? पुरुष क्या कर देगा? अब और पुरुष खो रहे हैं, पुरुष क्या कर देगा?
लोभ और काम में फर्क क्या है? क्या लोभ थोड़ा और सूक्ष्म है? साधारणतया, जो काम यह शब्द है, उसका एक स्पेसिफिक अर्थ है और उसका एक जेनेरिक अर्थ है। स्पेसिफिक अर्थ जो है, मतलब संकीर्ण रूप से जुड़ जाता है कि जो पुरुष-स्त्री का आकर्षण या मैथुन के लिए जो होता है, और जो लोभ होता है, वह साधारणतया भौतिक चीज़ों के लिए होता है। अभी कौन सा सूक्ष्म है, कौन सा स्थूल है, वो व्यक्ति की मानसिकता पर निर्भर होता है। कभी-कभी क्या होता है, कुछ लोभी व्यक्ति होते हैं, वो अपना धन का दिखावा बहुत करते हैं और कुछ-कुछ लोभी व्यक्ति होते हैं, जो क्या अपने धन को छिपा के रखते हैं, ताकि चोर वग़ैरह ना आए। मतलब कुछ स्थूल है, कुछ सूक्ष्म है, वो व्यक्ति की मानसिकता पर निर्भर होता है। कहीं लोग ऐसे होते हैं कि वो अंदर से बड़े कामी होते हैं, पर बाहर से खुद को बहुत अच्छा दिखाते हैं। तो यहाँ दो अलग-अलग प्रकार के, वो पर लोग के लिए हैं और वो बाहर के लिए हैं। दोनों मैटेरियल लेवल पर हैं, बड़े के लिए होता है तो वो काम वासना होती है और चीज़ों के लिए होता है तो वो लोभ होता है।
तो इनसे अगर मुक्त हो जाता है—तैरैविमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः। ज्ञानाधिकारी, इनसे अगर मुक्त हो जाता है—आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्। फिर उसके बाद में वो श्रेय अनुसार कार्य कर सकता है। हम जानते हैं प्रेय और श्रेय जो हैं, दूर के उसके से जो अच्छा है, उसके से क्या कर सकता है? ततो याति परां गतिम् और फिर वो परमगति प्राप्त करेगा इस प्रकार से।
तो यह भगवान बता रहे हैं कि इसको नियंत्रण करना चाहिए। नियंत्रण कैसे करें? इसके लिए अगले दो श्लोकों में बताएंगे भगवान। पहले बताएंगे कि वो नियंत्रण नहीं करें तो क्या होगा—
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्
जो शास्त्रविधिमुत्सृज्य को ठुकरा देता है, उसको सुख प्राप्त नहीं करता है, वर्तते कामकारतः। जो शास्त्रविधिमुत्सृज्य को ठुकरा देता है, उसको सुख प्राप्त नहीं होता है।
वरेशियस मतलब जो कुछ कोई संतुष्ट नहीं होती है, तो क्या है? और और और और चीजें बोलते हैं। तो अभी शास्त्र में गृहस्थ आश्रम बताया है, जिसके द्वारा वो व्यक्ति काम आश्रम को नियंतर्गत रूप से शुद्ध कर सकता है। पर गृहस्थ आश्रम का उद्देश्य क्या है? गृहस्थ आश्रम का जो शुद्धिकरण होता है, वो भोग से शुद्धिकरण नहीं होता है, उसके साथ से जो धार्मिक कार्य कर रहे हैं, उसके द्वारा साक्षात्कार आते हैं। तो इसके बाद में शुद्धिकरण होता है। तो इसलिए शुद्धिकरण नहीं होता है, आश्रम का जो शुद्धिकरण नहीं होता है, तो इसलिए शुद्धिकरण नहीं होता है।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि
इसलिए शास्त्र के अनुसार प्रतिपूजा चाहता है, शास्त्र को प्रमाण स्वीकार करके—कार्याकार्यव्यवस्थितौ अच्छी तरह से जो कार्य है, कार्य है उसको समझना है और फिर उसके मदद कार्य करता है—ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।
संस्कृति, परंपरा और शास्त्र का महत्व
मूढ़ और रीज़न, कल्चर मतलब अगर आप किसी को पूछते हैं कि आप जींस पैंट क्यों पहनते हैं? कि सब लोग पहनते हैं। कल्चर मतलब क्या? Everybody does it, आप ऐसे क्यों कर रहे हो? सब करते हैं इसलिए करते हैं।
और दूसरा है ट्रेडिशन। ट्रेडिशन मतलब क्यों कर रहे हैं? हमेशा से इसलिए करते आ रहे हैं। आप ये सत्यनारायण पूजा क्यों करते हो? पीढ़ियों से चल रहा है, हमेशा करते आ रहे हैं। तो एक है कि सब लोग करते हैं इसलिए मैं करता हूँ, वो कल्चर हो गया है। ट्रेडिशन मतलब हम पहले से करते आ रहे हैं इसलिए मैं करता हूँ।
तीसरा है मूड। ऐसे क्यों करते हो? अच्छा लगता है, करने को अच्छा लगता है करने को।
और चौथा है रीज़न। रीज़न मतलब ये बराबर था, इसमें एक सेंस यह बराबर लगता है। कहता है कि ये भगवान होते हैं, तो नास्तिक क्यों बन गए? मैं सोचा कि भगवान होते हैं तो दुनिया में दुख नहीं होना चाहिए था, इतने सारे दुख हैं तो भगवान कैसे हो सकते हैं? इसमें मैं सोचा कि भगवान नहीं है। तो इस तरह से व्यक्ति जो कार्य करते हैं, इन चारों कार्य-चीजों से करते हैं।
हम भी देखेंगे हमारे जीवन में कि इसके अनुसार हम कार्य करते हैं, पर क्या है? ये चारों जो मार्गदर्शक के लिए अच्छे हैं, पर यह आधार नहीं है। इन सबसे परे है शास्त्र। शास्त्र क्या है? क्या होता है कि हम हम ऐसे परिवार, हम ऐसे संस्कृति में रह सकते हैं कि जहाँ पर लोग कार्य करते हैं, सब लोग भी गलत कार्य कर सकते हैं। सब लोग गलत कार्य करते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि गलत कार्य सही हो जाता है।
अभी आजकल के समाज में ऐसे हो गया है। मित्र, अमेरिका में है, अभी साधारण अंतर क्या होता है कि जब कोई फॉर्म भरना होता है, कार का लाइसेंस चाहिए या कोई नहीं चाहिए, तो इसमें आपका लिंग क्या है पूछते हैं? पुरुष या स्त्री? कि आजकल के लोगों में पर उड़ते हैं, इतने अच्छे लगे कि वो लोग कहते हैं कि मेल, फीमेल और एनी अदर। तो एक आल्टरनेटिव आता है, क्योंकि बहुत से लोग कहते हैं एनी अदर, मतलब क्या? वो सर्जरी करते हैं, अपना लिंग बदल लेते हैं या वो बहुत कुछ कार्य करते रहते हैं। और आजकल के समाज में लोग तो इससे समाज से स्वाभाविक है, बहुत से लोग करते हैं। तो सब लोग करते हैं इसलिए कोई कहता है इसलिए मैं करता हूँ।
या कोई लोग क्या होते हैं? पूर्ण आदर के फँस जाते हैं, होस्टल में जाते हैं, सब लोग अगर वहाँ पर अष्ट्री चित्र देखते हैं, यह भी चित्र देखने करते हैं… भले यह ट्रेडिशन क्यों ना हो! ट्रेडिशन क्या होता है? कि अभी एक धार्मिक उत्सव होता है पाश्चात्य संस्कृति में, वो धार्मिक उत्सव होता है, पर उसमें क्या होता है? वो सारे परिवार वाले आते हैं और एक बड़ा टर्की लेके आते हैं। टर्की मतलब पक्षी होता है और पक्षी उड़ने से उड़ता है, और सारे परिवार वाले के सामने वो पक्षी को लाके काट देते हैं और फिर सबके सामने उसको पकाते हैं और खाते हैं उसको और कहते हैं कि ओ गॉड, थैंक्यू फॉर गिविंग अस टर्की और फॉर गिविंग अस एवरीथिंग एल्स। तो वो क्या है? वो उसको धार्मिक उत्सव मानते हैं, पर उसमें क्या करते हैं? वो इस तरह से जानवर को बड़ी बेरहमी से मारते हैं, पक्षी को मारते हैं।
तो संस्कृति में कोई बोल देगा कि what is tradition? रीतिरिवाज, पीढ़ियाँ, रीतिरिवाज, परंपरा। परंपरा बोल सकते हैं एक तरह से। तो कोई परंपरा आदर रूप से ऐसे करती आ रही है इसलिए करना है, वो भी उचित नहीं है। या फिर कोई कहता है कि ये मुझे अच्छा लगता है तो क्या है? हमारा मन इतना चंचल है कि अभी जो अच्छा लगता है कुछ समय के बाद वो अच्छा नहीं लगेगा। तो अच्छा लगता है इसलिए करूँगा, नहीं करूँगा, तो वास्तव में हम कभी भी सही मार्ग में रह नहीं पाएँगे। तो क्या होगा? अलग-अलग, अलग मन बोलते रहेंगे ये करो, वो करो, वो करो, वो करो। और अंत में क्या करना है, कुछ बताएंगे लिए। और हम लॉजिक भी इस्तेमाल कर सकते हैं, पर क्या है हमारी बुद्धि सीमित हैं, भगवान असीम हैं, जीवन के रहस्य हैं वो भी असीम हैं, इसलिए हमें शास्त्र का अध्ययन करना चाहिए। तो शास्त्र के अनुसार ही जीवन जीना चाहिए।
एक एक विषय वो अभी कई बार शास्त्र भी समझ लेते हैं और हमारे परंपरा रीति से हम अभी 3 बार हरी बोल बोलेंगे तो वैसे कुछ बोलते हैं, सिंपल-सिंपल सेंस हैं। पर तो किसे कहने होते हैं कि ये परंपरा में नहीं है, किसे कहने हैं परंपरा है शास्त्र में। कई बार व्यक्तियों में बोलते हैं कि ये शास्त्र में भी बोलना चाहिए। तो जो मर्मुत सिद्धांत है वो महत्त्वपूर्ण है और बाकी जो डिटेल्स हैं उसमें फर्क होते ही नहीं हैगा।
अभी अगर हम देखेंगे प्रभुपाद जी जो भी किया और प्रभुपाद जी ने कहा कि जो मेरे गुरु महाराज ने बताया वही मैंने बिल्कुल बताया जैसे है वैसे। पर अगर हम देखेंगे वास्तव में तो बहुत फर्क है। प्रभुपाद जी जो किया है, प्रभुपाद जी ने जो स्थापित किया गौड़िया मठ में जो भक्तिसिंधु ठाकुर ने किया था, उन्हें बहुत सा फर्क है। भक्तिसिंधु ठाकुर स्वयं कहीं बात, स्वर्ट पैंट उन्होंने भी अपने शिष्यों को बताया, सन्यासियों को भी आप जब अमेरिका, यूरोप में प्रचार करें, शर्ट-पैंट पहनो। प्रभुपाद जी अधिकांशतः से मत करो, बोलते थे प्रभुपाद जी। फिर जो विग्रह है हमारे इसमें गुरु परंपरा जो होती है वो राइट से लड़ाती है, मतलब पहले संसवरिष्ट गुरु होते हैं, फिर इसे हमारे गुरु आते हैं, वो गौड़िया मठ में उसका उल्टा है। तो गौड़िया मठ में कहीं भी गौर बताए नहीं है, प्रभुपाद जी ने गौर बताए डाले हैं। तो फिर अभी क्या है कि संबंध, अभिदेय और प्रयोजन इतनी चीज़ें हैं, तो संबंध ज्ञान बदलता नहीं है, प्रयोजन बदलता नहीं है। प्रभुपाद जी ने गौर… प्रभुपाद जी ने गौर बदलता नहीं है… जो देशकाल पात्र के अनुसार किस तरह से कार्य करना है, उसके लिए बहुत से लोगों को हम दूर रख देखें।
अभी पाश्चात्य देशों में होतो अभी-अभी यह नहीं-नहीं पुत्यसार, माँ यहाँ पता गया जब पुणे में आए थे, वो बता रहे थे। अभी भारत में पाश्चात्य देशों में आ रहे हैं कि अगर आप किसी को प्रणाम करते हो, दण्डवत करते हो, तो लोगों को लगता है यह क्या कर रहे हैं आप, क्या कुछ सौजन्य नहीं है, क्या सिखाते हैं संस्था में, कुछ सारा-सारा सौजन्य त्याग दो? तो वो बोलते हैं कहीं बार कि आजकल इस्कॉन में खास तौर से एयरपोर्ट में जहाँ पे लोग थे, वहाँ पे आप दण्डवत मत करो, बोलते हैं। तो क्या है? यह देशकाल पात्र के अनुसार है। तो प्रब्वजिक से अनुचित था, पर देशकाल पात्र के अनुसार परिवर्तन होगा है। साधारण त्याग क्या है? जहाँ पे लोग उस से गलत नहीं समझेंगे, खास करके जो खुद को लोगों प्रगतिशील, मॉडर्न मानते हैं लोग, जो जहाँ पे ऐसे अभी तक श्रद्धावान वातावरण है, वहाँ पे प्रणाम करते हैं, कुछ फरक समय से नहीं है। यह जो गुलामी थी अमेरिका में तब भी नियम था, जब भी वो मालिक आता है, सबको प्रणाम करता है, तो वहाँ पे लगता है लोगों के लिए जो प्रणाम गुलाम बना रहे हैं। तो इसलिए क्या होता है? यह देशकाल पात्र के हिसाब उसका फर्क ध्यान रखें, फिर उसको कार्य करना होता है।
तो इसलिए यह हरी बोल बोलना चाहिए, यह हरी कृष्ण बोलना चाहिए, यह क्या है? यह छोटी-छोटी बातें हैं और all of us in our life have to choose which battles we are going to fight। क्या है कि इतनी सारी चीज़ें हम कर सकते हैं कि यह करना चाहिए, यह करना चाहिए, यह करना चाहिए। तो कौन से सबसे महत्त्वपूर्ण है, किस से सबसे अधिक प्रभाव होगा, उसका चुन कर हमको कार्य करना चाहिए। तो अगर कोई प्रभुपाद जी की चीज़ें उनको लगता है यह बहुत महत्त्वपूर्ण है और यही करना चाहिए, तो ठीक है उनका वो भाव है, उसको हम आदर करते हैं। पर हम जानते हैं कि उसके साथ-साथ कि हर एक वरिष्ठ भक्त का यह भाव होता है, एक मूड होता है, एक एम्फैसिस होता है कि जो चीज़ जोड़ते हैं, उसके अनुसार कार्य करना है। हर एक परंपरा में अच्छी प्रभुपाद जी का खुद का उदाहरण देखे है।
श्रद्धा के तीन प्रकार
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु
त्रिविधा भवति श्रद्धा। प्रभुपाद क्या है होते हैं? देहिनां स्वभावजा, स्वभाव से श्रद्धा हो। देहिनां स्वभावजा, स्वभाव जा, जा मतलब जन्म होती है, स्वभाव से व्यक्ति की श्रद्धा जन्म होती है। और क्या है वो तीन प्रकार की—सत्व की, राजसिक, तामसिक। तो वहाँ बोलते हैं, इस श्लोक पर क्या होता है? अर्जुन का जवाब कि हाँ, इस श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, वो कैसे हैं? स्वभावजा, स्वभाव से आई है, उसका आगे लिखेंगे—
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धा मयोऽयं पुरुषो… सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धा वह पर दुपटा नहीं है, श्रद्धा में छह चीज़।
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः
यजन्ते सात्त्विका देवान। सत्वगुण में जो है वो देवताओं की पूजा करते हैं। यक्ष रक्षांसी राजसां। तो रजोगुण में जो है यक्ष-राक्षसों की पूजा करते हैं। प्रेतान भूत गनांशानी। वो प्रेतान भूतों की पूजा करते हैं। आप जानते हैं काला जादू की पूजा करते हैं, वो प्रेतान भूत गनांशानी।
तो शास्त्रों में दो प्रकार की विद्या बताई गई हैं कि आध्यात्म के ओर का सिवाना। एक है वेदान्त और दूसरा है तंत्र। वेदान्त में क्या है? कि वेदान्त में आत्मा और शरीर, प्रकृति और पुरुष का भेद जानना है। यह न इति, न इति, न इति जैसे भगवतगीता के दूसरे अध्याय में आता है—नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। अकेले दोयम, दोयम शो शेलचन कि यह भौतिक है, यह आध्यात्मिक है। इन दोनों में फर्क समझो, भौतिक को त्यागो और आध्यात्मिक हो जाओ। बहुत जो है वेदान्तक विधि है।
पर तंत्र क्या विधि है? तंत्र की विधि है कि जो भौतिक है, उसको इस्तेमाल करो आध्यात्मिक हो जाने के लिए। तंत्र की विधि क्या है? भौतिक चीज़ों को इस्तेमाल करो जिससे कि आध्यात्मिक तक पहुँच सके। जो विग्रहों की पूजा है, उसमें क्या है? भगवान का जो रूप है वो भौतिक तत्वों से बनाया है और उसके द्वारा हम भगवान की प्राप्ति कर सकते हैं।
तो तंत्र में राइट हैंड तंत्र है और लेफ्ट हैंड तंत्र है, दाया और बाया तंत्र का तंत्र है। उसमें क्या है कि जो जैसे विग्रहों की पूजा है, यहाँ जो है राइट हैंड तंत्र है, उसको मंगल को माना गया है, तो उसमें क्या है? समझते हैं कि जो भौतिक चीज़ें हैं, उससे आध्यात्मिक चीज़ों की प्राप्ति समझा सकते हैं, पर वो एक नियमित पद्धति से है, जो कुछ चीज़ें हैं भौतिक चीज़ें जो हमें भगवान के पास ला सकती हैं, पर कुछ चीज़ें ऐसी हैं जो भगवान के पास नहीं ला सकती हैं और उनसे हमें दूर रहना है।
पर जो लेफ्ट हैंड तंत्र है, उसमें क्या होता है? कि सब भौतिक चीज़ों से आप भगवान की प्राप्ति कर सकते हैं, तो उसमें क्या होता है? कि सोचते हैं कि आप मैथुन भी करोगे, मैथुन से आप आध्यात्म में भगवान कर सकते हैं, क्योंकि क्या है कि जो लोग सोचते हैं कि उससे बहुत से कुछ विचित्र चीज़ें होते हैं, पूरा भौतिक चीज़ों के बारे में जो भेद है… तो पूरा भौतिक चीज़ों के बारे में, पूरा भौतिक चीज़ों के बारे में… उसको छोड़ो, इसलिए इसका ही विकृत भाव है—संभोग से समाधि।
सत्वगुण में विष्णु की पूजा करते हैं, रजोगुण में किसकी पूजा करते हैं? देवताओं की पूजा करते हैं। तमोगुण में विष्णु की पूजा करते हैं, रजोगुण में ब्रह्माजी की पूजा करते हैं, सत्वगुण में विष्णु की पूजा करते हैं। यह वास्तव में मत्स्य पुराण में बताया गया है। पुराण जो अट्ठारह पुराण हैं, उनमें से यह सात्विक है, यह राजसिक है, यह तामसिक है। और सात्विक पुराणों में विष्णु की पूजा बताया गया है, सत्वगुण में विष्णु की पूजा बताया गया है। और जो देवियाँ शुर्जी की पूजा है, वो सत्वगुण में, तमोगुण है। मतलब कैसे होता है कि क्यों कहता है कि जो ग्रह सत्वगुण में है, जो शेर रजोगुण में है, बंदर जो है तमोगुण में है। पर हम जानते हैं कोई भी जानवर है, जानवर या नहीं मतलब वो तमोगुण में है, तो मतलब क्या है? वो तमोगुण में दर्ज है, तमोगुण में सत्व है, तमोगुण में रजो है, तमोगुण में तमो है। तो उस तरह से दर्ज है, तो उस तरह से अगर आप शास्त्रानुसार को पूजा कर रहा है, तो वो सत्वगुण में नहीं है। इसलिए हमें अगर कोई शुर्जी को बहुत पूजा कर रहा है, उससे नहीं बोला जाए तो तमोगुण में हूँ।
एक बार मुझे भक्त बता रहा था कि वो जो में भक्त है, वो बता रहा था कि उन्होंने किसी भक्त को बुलाया, वो एक बहुत बड़े, मुंबई के सबसे बड़े परिवार है, उनको बुलाया, वो उनको कल्टीवेट कर रहे थे और वो देवी के बड़े भक्त थे। तो ये गृहस्थ भक्त जो उनको कल्टीवेट कर रहे थे और उन्होंने किसी ब्रह्मचारी को बुलाया कि उसके बारे प्रवचन कर देखें, और उन्होंने वो अपने बड़े श्रद्धा से उनको लेके गए—”हम देवी की पूजा कर रहे हैं, देवी, तमो गुणा, निकाल दो इसको।” हम बोले कि अभी वो ना केवल इतने बड़े व्यक्ति थे, पर वो क्या है? श्रद्धा का भाव होता है, इस तरह से हम बोल नहीं चाहते कोई आप पूजा कर रहे हो, तो उसको निकाल दो। इसे वो धीरे-धीरे श्रद्धा से चेतना होता है व्यक्ति को, और हम देखते हैं यहाँ तक कि जब चैतन्य महाप्रभु जाते हैं अपनी यात्रा में, तो वो भुवनेश्वर में जाते हैं, वहाँ पर वो शुर्जी के मंदिर के साथ मुंज करते हैं, और तभी वो शुर्जी के मंदिर के साथ क्या है? हमें सांस्कृतिक दृष्टि से देखना है, वास्तव में वो भी विग्रहों की पूजा करते हैं, कईयों को रक्षण करते हैं, कईयों को समर्थन करते हैं। फिर वो शास्त्रों में, शास्त्रों में उनको श्रद्धा है, तो ऐसे लोगों को सांस्कृतिक दृष्टि…
असुरों की घोर तपस्या और श्रद्धा के भेद
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनः। दम्भाहंकारसंयुक्ताः…
जब हिरण्याक्ष या रावण या जो भक्तासुर था, वो अपना मांस काट के शुर्जी के यज्ञ में डालने लग गया, तो वहाँ पर शुर्जी आ गए, इसलिए नहीं कि वो पसंद नहीं थे, होले कि शुर्जी अपने जान त्यागने लग गया है, तो वो अपने यहाँ पर आता है क्यों? अपने यहाँ त्यागने लग गया है, क्यों अपने जान त्यागने लग गया है?
तो क्या होगा? जब यह बहुत पाश्चात्य शताब्दी थी, 5th सेंचुरी बीसी से लेके काफी समय तक लग गए, 1500 साल तक भारत में बुद्ध की संस्कृति भोग थी और शंकराचार्य जब आए उन्होंने बहुत अधिक बौद्ध धर्मों का, उसका खंडन किया। पर फिर भी वो जो मानसिकता थी, वो वैसे ही रही और उसके कारण जब बाहर से आक्रमणकारी आते थे, तो उसका ज़्यादा उसका प्रतिकार करने का भाव नहीं था और उसके कारण बहुत बार भारत पर दूसरे लोग ने आक्रमण करके हरा लिए भारत को।
तो अभी क्या करते हैं ये बुद्ध लोग कहते हैं कि अभी हम किसी पर हिंसा नहीं करेंगे। पर क्या होता है? अभी डिबेट नाम के जगह है, भारत के पश्चिम, भारत के उत्तर में, वहाँ पर बुद्ध लोग रह रहे थे और उसको चाइना ने आक्रमण करके जीत लिया। वो तब ये बुद्ध लोग कहते हैं कि हम हिंसा नहीं करेंगे, पर चाइना की सरकार वहाँ पर नास्तिकवाद फैला रही है, वहाँ पर क्या है? बुद्ध धर्म को नष्ट करने का प्रयास करेंगे। तो उसको विरोध करने के लिए क्या होता है? कई बौद्ध साधु जो होते हैं, वो सेल्फ-इमोल्यूशन करते हैं, खुद को चला रहते हैं, वो कहते हैं कि हम हिंसा नहीं करेंगे, पर क्या कर रहे हैं? खुद के शरीर की हिंसा कर रहे हैं। तो वो हिंसा ही एक तरह से… हिंसा तो हिंसा है! एक दूसरे के शरीर में हिंसा कर रहे हैं, खुद के शरीर में हिंसा कर रहे हैं।
तो क्या है? इस तरह से खुद के शरीर को यातना देना, यह क्या है? तामसिक है—तप्यन्ते ये तपो जनाः। तप्यन्ते ये तपो जनाः इस भौतिक जगत में करश्यति, ये स्वभाव है भक्तिस्थानी करश्यति, जो पंद्रह विद्याओं के साथ से शुरू करेंगे। पर करश्यन्त जो खुद और पीड़ा बढ़ाते हैं, तामिद्या आसुर विद्या, बाल खींच के निकालते हैं, वो क्या होता है? कि वो सोचते हैं कि ये शुद्ध चेतना के परिणाम है, इसलिए मैं बाल मुँडूँगा और कुछ दर्द नहीं होगा, दर्द होगा तो मैं उसके परिणामोंगा। तो इस तरह से यह शरीर के प्रति अत्याचार करने की ज़रूरत नहीं है। वास्तव में हमें क्या करना है? शरीर को भगवान की सेवा में इस्तेमाल करना है। यह तामसिक है और शास्त्रविरुद्ध भगवान की सेवा करते हैं, वो आसुरी प्रवृत्ति है।
इसके बाद में हम किस तरह से लोग अलग-अलग गुणों में होते हैं, उसकी चर्चा करें। वो तो तीनों गुणों की चर्चा चौदहवें अध्याय में हो चुकी है, पर यहाँ पर क्या चर्चा कर रहे हैं? यहाँ पर चर्चा का उद्देश्य है, भगवान बोलेंगे, व्यक्ति का अन्न तीन गुणों में हो सकता है, व्यक्ति का यज्ञ दान तपः तीन गुणों में हो सकता है। यहाँ बता रहे हैं कि उनका सवाल क्या है कि जो शास्त्र का पालन नहीं कर रहे हैं, कि श्रद्धा कैसी है? तो उसका जवाब भगवान दे रहे हैं कि वो आप उसके गुणों के अनुसार देखो।
मतलब अगर कोई व्यक्ति अभी कोई बाबा की पूजा कर रहा है या ऐसे कुछ कर रहा है, तो अभी उसकी श्रद्धा कहाँ है? सत्व गुण में, रजो गुण में, तम गुण में? तो उसके पूजा के कारण उसके जीवन में प्रभाव क्या हो रहा है? अभी बहुत से ऐसे भारत में पंथ होते हैं, जो मार्ग होते हैं, जो किसी अपने गुरु को भगवान मान लेते हैं, तो वो एक तरह से मायावाद हैं। पर अगर हम देखेंगे, उसके कारण भी उनके जीवन में कभी सकारात्मक परिवर्तन होते हैं। तो मायावाद में भी क्या होता है? हम सब को मायावाद बोल सकते हैं, पर कुछ-कुछ ऐसे होते हैं कि वो अपने गुरु को भगवान मान लेते हैं और फिर वो शराब पीते हैं, नशापान करते हैं, सब बुरे कार्य करते हैं। पर कुछ लोग होते हैं कि वो गुरु को भगवान मान लेते हैं, पर उसके कारण उनके जीवन में कुछ सकारात्मक परिवर्तन होते हैं, शुद्ध भक्ति नहीं आएगी, पर उसके कारण में कुछ समाज सेवा करने लगते हैं, कुछ तरह से सकारात्मक परिवर्तन होते हैं क्योंकि वो व्यक्ति को बोलते हैं कि जो शास्त्र का पालन नहीं कर रहा है, वो सबको एक कैटेगरी में डाल सकते हैं, सब अज्ञानी नहीं बोल सकते हैं। उसमें वो व्यक्ति किस प्रकार से जीवन जी रहा है, वो उसके कार्य कर रहा है, उसको देख के हमें समझना पड़ेगा कि उसकी श्रद्धा सत्व गुण में है, रजोगुण में है या तमोगुण में है।
तो उसकी चर्चा हम अगले प्रवचन करेंगे।
श्रीमद् भगवद्गीता की जय! श्रील प्रभुपाद की जय!