Gita 17.07-16 – Understanding food, sacrifice and austerity from material and transcendental perspectives (Hindi)
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Lecture Summary
श्रीमद्भागवतगीता – सत्रहवां अध्याय (श्रद्धात्रयविभाग योग): सारांश
यह सत्रहवां अध्याय शद्धा, आहार, यज्ञ, तप और दान के तीन रूपों (सत्त्वगुण, रजोगुण और तमगुण) के विस्तृत विश्लेषण पर आधारित है। यहाँ मुख्य बिंदुओं का सारांश प्रस्तुत है:
१. श्रद्धा का स्तर और उसका मूल्यांकन
- अंतरंग चेतना: किसी व्यक्ति की श्रद्धा का स्तर पूरी तरह उसकी अंतरंग चेतना और आंतरिक भाव पर निर्भर करता है, जिसे किसी बाहरी यंत्र (जैसे माइक्रोस्कोप या सीटी स्कैन) से नहीं देखा जा सकता।
- पहचान का आधार: व्यक्तियों की श्रद्धा का स्तर उनके द्वारा किए जाने वाले यज्ञ, उनके आहार, उनके द्वारा दी जाने वाली दान-दक्षिणा और तपस्या के स्वरूप को देखकर समझा जा सकता है।
२. ब्रह्मांडीय वर्तुळ (Concentric Circles) और जीवन
- मनुष्य तीन बड़े वर्तुळों (शरीर, समाज और ब्रह्मांड) में स्थित है।
- इन तीनों स्तरों से हमें विभिन्न प्रकार के क्लेश या दुःख मिलते हैं:
- आधिदैहिक क्लेश: शरीर से मिलने वाला दुःख।
- आधिभौतिक क्लेश: समाज या अन्य जीवों से मिलने वाला दुःख।
- आधिदैविक क्लेश: ब्रह्मांडीय या प्राकृतिक शक्तियों से मिलने वाला दुःख।
- इन तीनों स्तरों पर अपने उत्तरदायित्वों और कर्तव्यों को निभाने के लिए ही यज्ञ, दान और तप के विधान हैं।
३. आहार के तीन प्रकार
अग्रिम श्लोकों में भगवान आहार (भोजन) के तीन प्रकार बताते हैं:
- सात्त्विक आहार: यह आयु, सत्त्व (बुद्धि/चेतना), बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाला होता है। यह रसयुक्त, स्निग्ध और स्थिर होता है।
- राजसिक आहार: अत्यधिक कड़वे, खट्टे, नमकीन, बहुत गर्म, तीखे, रूखे और दाह उत्पन्न करने वाले पदार्थ राजसिक लोगों को प्रिय होते हैं, जो दुःख, शोक और रोग पैदा करते हैं।
- तामसिक आहार: जो भोजन बासी, रसहीन, सड़ा हुआ, गंदा (अपवित्र) या उच्छिष्ट (झूठा) होता है, वह तमोगुण को प्रिय होता है।
४. यज्ञ के तीन प्रकार
- सात्त्विक यज्ञ: जो यज्ञ शास्त्रों की विधि के अनुसार, फल की इच्छा से रहित होकर, केवल “यह मेरा कर्तव्य है” इस भाव से किया जाता है, वह सत्त्वगुणी है।
- राजसिक यज्ञ: जो यज्ञ केवल फल की आकांक्षा से या दंभ (दिखावे) के लिए किया जाता है, वह राजगुणी होता है।
- तामसिक यज्ञ: जो यज्ञ शास्त्रों की विधि के विरुद्ध, मंत्रहीन, बिना दक्षिणा और बिना श्रद्धा के संपन्न किया जाता है, वह तामस यज्ञ कहलाता है।
५. तपस्या के तीन आयाम (शरीर, वाणी और मन)
तपस्या को तीन स्तरों पर विभाजित किया गया है:
- शारीरिक तप: देव, द्विज (ब्राह्मण), गुरु और प्राज्ञ (ज्ञानियों) की पूजा, पवित्रता (शौच), सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा—यह शरीर का तप है।
- वाणी का तप: दूसरों को विचलित न करने वाले, सत्य, प्रिय और हितकारी वचन बोलना तथा स्वाध्याय करना वाणी की तपस्या है।
- मानसिक तप: मन की प्रसन्नता, सौम्य स्वभाव, मौन, आत्म-संयम और भाव की शुद्धि—यह मन का तप कहा गया है।
Full Transcription
श्रीमद्भागवतगीता – सत्रहवां अध्याय: श्रद्धात्रयविभाग योग
सत्रहवें अध्याय में दैवी और आसुरी संपद् के बीच के लोगों का वर्णन हो रहा है। जिनको श्रद्धा है पर शास्त्रों में श्रद्धा नहीं है, शास्त्रों के अलावा जो श्रद्धा है, उनके बारे में वर्णन हो रहा है। उनका क्या स्तर है? क्या उनकी श्रद्धा सत्त्वगुण, रजोगुण, तमगुण में है? यह कैसे समझ सकते हैं हम? श्रद्धा यह अंतरंग होती है। तो हम कोई माइक्रोस्कोप या एक्स-रे या सीटी स्कैन लेकर किसी की श्रद्धा का स्तर क्या है देख नहीं सकते हैं। उनकी अंतरंग चेतना, उनकी अंतरंग श्रद्धा का स्तर है।
इसलिए अभी सत्रहवें श्लोक से भगवान बताएंगे कि कैसे हम लोगों का उनका यज्ञ, अन्न, यज्ञ, दान, और तपस्या, यह सब बाहरी सूची से हम कार्य देख सकते हैं। यह देख कर हम उनकी श्रद्धा का स्तर समझ सकते हैं।
आहार, यज्ञ, तप और दान के तीन भेद
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञास्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु॥
तो तेषां भेदम, इन सबका भेद, किस प्रकार का भेद, तीन भागों में भेद हैं। तो अभी यज्ञा, दान, तपः, यह बहुत महत्वपूर्ण कार्य हैं। क्या होता है कि हम, अगर हम देखते हैं तो हम, जो आत्मा हैं, वो तीन वर्तुळ, concentric circles, तीन चीजों में वो स्थित हैं। क्या है, एक हमारा शरीर है, उसमें आत्मा स्थित है, फिर उसके बाद में हमारा समाज है, उसमें हम स्थित हैं, फिर उसके बाद में एक बड़ा सर्कल जो है, गोलाकार जो है, वो क्या है, हमारा ब्रह्मांड।
और यह तीनों हैं, इन तीनों से हमें सुख भी मिलता है, दुःख भी मिलता है। तो इन तीनों से जो दुःख मिलता है, उसको कहते हैं, शरीर से जो दुःख मिलता है, उसे आधिदैविक, आधिदैहिक क्लेश कहते हैं। जो समाज से दुःख मिलता है, उसको आधिभौतिक क्लेश कहते हैं। और जो ब्रह्मांड के स्तर से, हमसे परे जो है, उसको दैविक दुःख या आधिदैविक क्लेश कहते हैं।
जब कई बार यज्ञ होते हैं तो आखिर में कहते हैं, ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। इन तीन वर्तुळों में जब हम स्थित हैं, उनके प्रति हमारे कर्तव्य हैं, हमारे उत्तरदायित्व हैं, उनको पूरा करने के लिए यह तीन ब्रह्मांड रूपी वर्तुळों में इसके अस्तित्व के लिए यज्ञ हैं। तो यज्ञ, दान, तप। तो इस तरह से यह तीनों महत्वपूर्ण कार्य हैं।
और वास्तव में कोई कहेगा कि इस दुनिया में इतने सारे लोग हैं जो कुछ है कि दान तप ही करते हैं। पर वास्तव में सब प्रकार के लोग कुछ ना कुछ तो करते हैं इसके लिए। कोई व्यक्ति बॉम्बे में रहता है तो वो लोकल में जाता है, लोकल में इसमें ५० लोग बैठ सकते हैं तो वो भी एक प्रकार की तपस्या है। तो उससे लोग कहेंगे मैं दान नहीं दूंगा पर फिर उनको टैक्स देना पड़ता है, क्या है, हमारा समाज से आदान-प्रदान तो होते ही रहता है। और फिर लोग अलग-अलग प्रकार के दान भी देते हैं। तो यज्ञा, दान, तपस्या यह सब करते हैं।
प्रकृति और निसर्ग के साथ संबंध
तो अभी कोई कहेगा कि मैं कोई यज्ञ नहीं कर रहा है, कोई अग्नि जलाकर पाश्चात्य देश में कोई यज्ञ नहीं कर रहा है, पर क्या है? सब लोग कुछ ना कुछ समझते हैं कि यह ब्रह्मांड है, अब ब्रह्मांड से हमारे कुछ आदान-प्रदान हैं।
तो सबसे पहले १६वीं, १७वीं, १८वीं अर्थी में माइनिंग चालू हो गया। माइनिंग मतलब जमीन को खोदना, जिससे कि धातु निकाल सकते हैं। तो तभी कई वहां के लोगों ने उसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह जो है, जो पृथ्वी जो है, उसकी जो भेंट है, जो हमें देना चाहती है, वो जमीन पर देती है और जो जमीन के अंदर है, उसको खोद के निकालना, यह हमारा अधिकार नहीं है, उससे पर्यावरण, उससे समाज उद्ध्वस्त हो जाएगा, उससे पर्यावरण वैज्ञानिक रूप से किस प्रकार से उससे समस्या आएगी, यह उनको भले आज इसके पता चला होगा, वो पता नहीं होगा, पर क्या है, यह सभी पाश्चात्य देशों में भी समझ थी।
जूर्टकर्मा प्रोभी हैं, वैज्ञानिक भी हैं, उन्होंने एक किताब लिखी है, डिवाइन नेचर, उसमें बताते हैं कैसे जो निसर्ग है, उसको देखने का दृष्टिकोण पहले, भारत में हो या पाश्चात्य देशों में, पहले निसर्ग के अनुसार हमें जीना है।
हम निसर्ग में, पहले भारत में ऐसे था कि जंगल होते थे, तो कोई भी आके जंगलों को तोड़ नहीं सकता था। जंगलों को कहते हैं कि वे सारे समाज की संपत्ति है और कोई आके उसको लकड़ी करते हैं, तो एक समय ऐसा था कि हम निसर्ग के सामने पूरी तरह से असहाय हैं कि निसर्ग में बड़ा भूकंप आ जाएगा, बड़ी बारिश आ जाएगी, तूफान आ जाएगा, तो हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं, हम बेबस हैं।
तो इसलिए यह निसर्ग के सामने हम लाचार हैं, ऐसा विचार था। पर बाद में वैज्ञानिकों ने सोचा कि हम अभी निसर्ग को नियंत्रित करेंगे, तो कुछ हद तक हम निसर्ग को, हम तैयारी कर सकते हैं।
तो अभी क्या होता है, अभी भारत में, अमेरिका में भी फर्क है कि अमेरिका में बहुत से तूफान आते हैं और तूफान वगैरह तो जब आते हैं, तो तभी वह बहुत विध्वंस करते हैं, पर क्योंकि वहां पर तंत्रज्ञान है, तो वह काफी हद तक उसका भविष्यवाणी कर सकते हैं कि तूफान आने वाला है। तो जब वह तूफान आता भी है, तो पहले से लोगों को चिंता दे देते हैं, तो लोगों को तूफान के इलाके से निकाल लेते हैं।
और वहां से जो संपत्ति का विध्वंस होता है, घर उड़ जाते हैं, फैक्ट्रियां खराब हो जाती हैं, रास्ते उद्ध्वस्त हो जाते हैं, पर साधारणतया लोगों की हत्या कम होती है, क्या होता है, वह लोगों को बचा लेते हैं। पर क्या है, भारत में उस प्रकार की अधुनातन तंत्रज्ञान नहीं है, तो इसलिए क्या होता है, अगर कोई तूफान आने वाला है, तो फिर वह तूफान की भविष्यवाणी लोगों तक पहुँचने के पहले…
तो जो रूप से विस्तारित समझ है, वो वैदिक शास्त्रों से आती है। यज्ञ, दान, तप भले ही हमको लगे आज के जमाने में कोई कर नहीं रहा है, पर उसके अंतरंग जो भाव होगी, हम समझते हैं तो समझते हैं कि वो विश्वव्यापी है, वो हमेशा रहने वाला है। पर किस तरह से यज्ञ, दान, तप करना है, वो समझना है।
तो अभी भगवान बताएंगे आहार के बारे में पहले बताएंगे, फिर यज्ञ, दान, तप के बारे में।
आहार के तीन प्रकार: सात्त्विक आहार
आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥
तो अभी आहार का उद्देश्य क्या है? प्रभुपाद जी तात्पर्य में पहले बोलते हैं, पहली वाक्य में अभी प्रवचन दिनों श्लोकों के तात्पर्य एक साथ दिया है, भाषांतर अलग है, पर तात्पर्य एक ही है।
आयुः सत्त्वबलारोग्य… हमारे अन्न खाने का उद्देश्य क्या है? हमारी आयु बढ़ाए। फिर सत्त्व, हमारा जो मानसिकता है, हमारा अस्तित्व है, उसको ठीक करें, क्योंकि सत्त्व में हम चेतना बोलते हैं, मन को शुद्ध करें।
आयुः सत्त्वबलारोग्य यह सब शारीरिक दृष्टि से हो गया और उसके अलावा मानसिक दृष्टि में क्या है? सुखप्रीतिविवर्धनाः, जो हम अन्न खाते हैं, उससे सुखप्रीति बढ़ती जाएगी।
आयुर्वेद के ग्रंथ में वर्णन आता है कि अन्न के तीन प्रकार के परिणाम होते हैं: भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक।
जो हम अन्न खाते हैं भौतिक स्तर पे, उसका क्या परिणाम होता है कि हम जो अन्न खाते हैं, उससे हमें शरीर की कोई-कोई शक्ति मिलती है। तो जो आजका विज्ञान है, वहाँ इसको देखता है अधिकाश रूप से कि शारीरिक स्तर पे किस तरह से क्या खाना चाहिए, क्या नहीं खाना चाहिए।
और उसके अलावा आयुः सत्त्व… जो मानसिक स्तर पे है कि हमारे मन पे भी जो हम खाते हैं, उसका प्रभाव होता है। वो सात्विक, राजसिक, तामसिक खाएंगे, तो उसका प्रभाव होगा।
और उसके परे जो हम आत्मा के स्तर पे हैं, भगवान को प्रसाद अर्पण करते हैं… तो भाषा होती है, भाषा बोलते समय उसमें कई बार अलंकार इस्तेमाल करते हैं, जिसे पता रहता है फिगर ऑफ स्पीच। तो संस्कृत में अलंकार का नाम पता नहीं है कि उसको, तो ओंमैटोपोईआ बोल दिया… ओमैटोपोईआ बोल दिया, मतलब क्या, कर्कश शब्दों की ध्वनि में क्या है, समासा कर्कशता है।
राजसिक और तामसिक आहार
तो ऐसे ही हम देखते हैं रजोगुण का वर्णन आ रहा है: कटुलम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः। आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥
तो यह शब्दों की ध्वनि है, वही उसके अर्थ का केवल संकेत कर रही है कि जो अन्न है, यह कैसे है? यह बड़ा काटता है इन तरह से।
और कई बार क्या होता है, लोग इस प्रकार का अन्न खाते समय जलन होती है, पर उसके अर्थ का उस मजा आता है क्या? लोग बहुत मसालेदार चीजें खाते हैं, कांदा-लहसुन खाते हैं, आपको उस पानी आता है खाते समय? मजा आता है इसलिए कहना यह क्या है? यह राजसिक है।
तो अभी इसमें हम पहले यह तीनों देख लेते हैं, तब तामसिक देखते हैं:
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥
यातयामं… तो काफी अन्न पकाने के बाद, जब काफी समय के बाद उसको पका रहे हैं, गतरसं जिसका रस चला गया है। तो देखो शास्त्रों में आता है रसस्य निष्कास दिरादवत्या, गतरसम मतलब उसका बिल्कुल विपरीत, रस चला गया है।
और पूति पर्युषितं च यत्, जिसकी गंदा आ रही है।
दुःख शोक आमयप्रदः… क्या है यहाँ तीन प्रगति चीजें खाते समय दुःख होता है, खाने के बाद क्या है, तृष्णा असंतुष्टि होती है, इससे शोक होता है और उसके बाद धीरे-धीरे बीमारी आ जाती है। इसके बाद क्या है, तृष्णा असंतुष्टि होती है, भगवान का स्मरण नहीं होता है।
मतलब क्या? भगवान का स्मरण बहुत कम होता है। तो ऐसे नहीं है कि इसमें बिल्कुल भक्ति नहीं करनी चाहिए, पर क्या है हर एक भक्त को अपने समझ के अनुसार मुझे क्या महत्वपूर्ण है, किस तरह से मैं भक्ति कर सकता हूँ, यह किस तरह से मैं भक्ति में स्थिरता से प्रगति कर सकता हूँ, यह समझ के अन्न को चुनना है।
तो कभी-कभी क्या होता है? कुछ भक्त ऐसे होते हैं, यह शरीर का भी स्वभाव होता है, क्या होता है? जो भक्त का स्वभाव जरा कफ प्रकृति का होता है, तो उनको उपवास करना आसान जाता है। कुछ भक्त होते हैं, उनका पित्त का स्वभाव होता है, उनको उपवास करना बड़ा कठिन हो जाता है।
तो क्या है, जिस तरह से उपवास जो है, कुछ-कुछ दिन है हमारे एकादशी, महत्वपूर्ण, तभी हम उपवास करते हैं, पर बाकी एकादशी वगैरह हैं, तो जिस तरह पर हम उपवास कर सकते हैं, उस तरह कर सकते हैं।
तो उसी तरह से जो उपवास के रूप में तपस्या है, वो व्यक्तिगत रूप से फैसला करा जा सकता है। तो ऐसे ही जो अन्न है, वो व्यक्ति किस प्रकार का प्रसाद खाएगा, इसका हर एक भक्त को अपने-अपने गंभीरता के अनुसार, अपनी मानसिकता के अनुसार ही फैसला करना है। पर हम समझना चाहते हैं कि जो भी अन्न खा रहे हैं, उसमें कितना हमारे भगवान का स्मरण हो रहा है, वो देखना चाहते हैं।
तो कभी कोई अचार बन जाता है, तो कुछ भक्त यह अचार जो होता है, राजसिक होता है। तो कुछ भक्त नहीं, जो भी भगवान को अर्पण करते हैं, वो प्रसाद होता है, वो देखना चाहते हैं। यह राजसिक नहीं है तब, यह राजसिक है, यह देखना चाहते हैं।
अभी क्या है, यह हमें व्यक्तिगत रूप से फैसला करना है कि इसका मुझपर क्या प्रभाव होता है। प्रभुपाद जी को पता था कि दूध पीने से क्या होता है, अभी बुद्धि के विकास होता है, तो भक्त बहुत ज्यादा दूध पीने लगते हैं। तो प्रभुपाद जी ने कहा कि यह क्या है राजसिक, दूध पीना चाहिए, पर उचित मात्रा में पीना चाहिए। हर एक व्यक्ति के लिए क्या उचित है, जिसके लिए एक स्टैंडर्ड हम नहीं बना सकते, हर व्यक्ति को अपनी बुद्धिमत्ता के अनुसार, अपनी गंभीरता के अनुसार, अपनी मानसिकता के अनुसार फैसला करना चाहिए।
तो ऐसे नहीं है कि कोई अगर भक्त पिज़्ज़ा खा रहा है, तो वो कम प्रगतिशील है। वो व्यक्ति किस संस्कृति से आ रहा है, किस पृष्ठभूमि से आ रहा है, वो हमें पता नहीं है। खास करके जब पृष्ठभूमि से भक्त आते हैं, वो पिज़्ज़ा खाएंगे, तो क्या है, उनके लिए वो स्वभाव है। पर हमारे लिए, वन से इन-ए-व्हाईट अगर हो गया, तो वो ओके है, पर नियमित रूप से जो हमारा स्वभाविक अन्न है, उसी को हम खाते हैं, तो वो हमारे भक्ति के लिए अनुकूल है।
तो भक्ति में हम अधिकांश रूप से सत्त्वगुण, रजोगुण, तमगुण अन्न का जो है, वार लक्षण देखने से ज्यादा क्या कि इसका मुझपे क्या प्रभाव हो रहा है, तो वहाँ देखकर फिर हम फैसला कर सकते हैं।
उच्छिष्ट (झूठा) भोजन का विचार
इसलिए यह सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण प्रसाद की दिव्यता है, वो सत्य है, पर उसके साथ-साथ प्रसाद का भौतिक स्तर पे हम पे प्रभाव होता है। तो अगर मैं बहुत ज्यादा स्वीट्स खाऊंगा, तो शरीर में डायबिटीज हो लेगा। तो मैं कहूंगा यह प्रसाद दिव्य है, पर फिर बाद में भी पता चला कि मेरा शरीर दिव्य नहीं है, शरीर के ऊपर तो प्रभाव हो ही जाएगा।
तो इसलिए हमें बुद्धिमत्ता से, परिपक्वता से यह हमारा किस पता चलेगा, वो फैसला करना है। यह उच्छिष्ट हमारे लिए क्या करेगा? तो प्रभाव होता है सिर्फ जो सद्भवतों का स्मरण हो सकता है।
तो गाय का दुग्ध होता है, क्या गाय का दुग्ध होता है? पहले वो जो होते हैं, मैं यहां पीता थोड़े ही हो सकता है, पर उससे देखे जाएं तो एक महाराष्ट्रीयन संत है, वो कहते हैं कि हे भगवान, मैं आपको क्या अर्पण कर सकता हूँ? मैं अगर आपको फूल अर्पण करना चाहूँ तो वो मधुमक्खी ने फूल का जूस पहले ही ले लिया है। मैं अगर फल अर्पण करना चाहूँ तो कितने सारे पंछी आके वो फल को पहले ही स्पर्श कर लिया है।
तो आशा है, इस जगत में कुछ भी इतना शुद्ध नहीं है कि आपको अर्पण कर सकूँ, पर फिर भी मेरी भक्ति आपको दर्शाने के लिए मुझे आपको अर्पण करना है, तो कृपया स्वीकार कीजिए। यह जो है, नैसर्गिक पद्धति से जो निसर्ग ने बनाया है कि जो गाय दूध देती है, उसके थोड़े मात्रा तो उसके बछड़े के लिए और बाकी जो है, मानवों के लिए, तो उसको उच्छिष्ट नहीं मानते हैं कि वो एक नैसर्गिक पद्धति से आ रहा है।
जो उच्छिष्ट को खराब ही माना गया है, क्योंकि हमारी चेतना का प्रभाव होता है हर व्यक्ति का। तो जो व्यक्ति की शुद्ध चेतना है और शुद्ध चेतना से हमारी चेतना शुद्ध हो सकती है। पर साधारण देव उच्छिष्ट खाना, यह उच्छिष्ट नहीं है।
यह जो सत्रहवें चैप्टर में, यह बीच में के लोगों का वर्णन हो रहा है, न आसुरी है, न दैवी है, लेकिन यहाँ पर जो तामसिक आहार वगैरह है, वो आसुरी लोगों के लिए उसमें श्रद्धा होती है। तो यहाँ पर एक ऐसी पट्टी नहीं है, वो बीच में लोगों को डायरेक्ट करती लिखा रहा है और फिर से एक कॉमन डिलीजन हो रहा है, अच्छा सब लोग के लिए है।
तो अभी साधारण देव में आसुरी लोगों के बारे में वर्णन किया गया है, पर यहाँ पर सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण के बारे में बताए हैं। तो जो आसुरी लोग हैं, वो भी तमोगुण में ही आएंगे और रजोगुण में आएंगे।
तो फिर यह जो विभाजन है, क्या यह आसुरी लोगों को भी आसुरी इन्क्लूड करता है, समाहित करता है इसमें? यह एक इन्क्लूड है, यह दैवी लोगों में भी आ जाएगा, क्योंकि दैवी लोग भी कुछ न कुछ खाने वाले, आसुरी लोग भी कुछ न कुछ खाने वाले। तो अगर दैवी गुण और आसुरी गुण दिख रहे हैं हमको, तो उससे दैवी है या आसुरी है, जो शास्त्रों के लिए जी रहे हैं, शास्त्रों के लिए नहीं जी रहे हैं, पर उसके अलावा जो है, हम समझना है तो यह लक्षण है।
मतलब यह लक्षण सबके लिए है, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण, अन्न का जो भोजन है, यह केवल मानवों के लिए नहीं है, यह केवल दैवी और आसुरी के बीच में के लिए नहीं है, सबके लिए है। पर जिनका दैवी-आसुरी गुण हैं, शास्त्र के पालन या शास्त्र का उल्लंघन, इससे समझ नहीं सकते हैं, मतलब उनमें श्रद्धा है किस तरह की, पर क्या है, शास्त्र के अनुरूप श्रद्धा नहीं है, तो उनको समझने के लिए इससे बताया गया है।
यज्ञ के तीन प्रकार
अभी इसके बारे में भगवान, यज्ञ के बारे में बताते जाएंगे।
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इष्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥
अभी सत्त्वगुण में जो ये कर रहे हैं, उसका लक्षण क्या है? अफलाकांक्षिभिः यज्ञः, जो फल की आकांक्षा नहीं है। विधिदृष्टः, यह मेरी विधि है, मेरा कर्तव्य है। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः, सत्त्वगुण में जो ये कर रहे हैं।
अभिसंधाय तु फलं दम्भाथ्र्मापि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥
अभिसंधाय तु फलं, फल की आकांक्षा से कर रहा है कार्य। और दम्भाथ्र्मापि चैव यत्, दिखावा कर रहा है, मैं ऐसे कर रहा हूँ, मैं इस तरह रह रहा हूँ और दुनिया में दिखाया जाता है कि मैं इतना बड़ा है, जब मैं धर्म करता हूँ तब, तब मैं पता है था। इज्यते भरतश्रेष्ठ, ऐसा जो यज्ञ करता है, तं यज्ञं विद्धि राजसम्, ऐसा यज्ञ जो है, वो राजसिक है।
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥
विधिहीनमसृष्टान्नम्, विधिहीनम् मतलब शास्त्रों का पालन नहीं है, असृष्टान्नम् हो रहा है। मन्त्रहीनमदक्षिणम्, कुछ मंत्रों का भी जप नहीं हो रहा है, दक्षिणा भी इस स्वरूप से नहीं दिया जा रहा है।
तो ऐसा जो है, जो है तामसिक है। तो बात बहुत है, हम बता रहे हैं कि यज्ञ भी कोई कर रहा है, पर वो उचित पद्धति से नहीं कर रहा है, तो वो भी तामसिक है।
हम देखते हैं रामायण में जो रावण था और उसके राक्षस थे, जब रावण युद्ध करने जा रहा था, तो तभी उसके भी ब्राह्मण थे और वह उसके मंगल के लिए यज्ञ कर रहे थे, उचित पद्धति से नहीं कर रहा था।
जब पांडव दक्षिण की ओर उत्तर की ओर जाते हैं बद्रीकाश्रम की ओर, तो वो कहते हैं कि ब्राह्मण होगा, अब आप जो तपस्या कर नहीं सकते हैं, जो साधारण अन्न पर जी नहीं सकते हैं, कृपया आप हमारे साथ मत आइए। जो क्योंकि आप तपस्या की क्षमता जानते हैं, वहीं आप आइए। तो वहाँ भी बद्रीकाश्रम की ओर उत्तर की ओर, तो वो कहते हैं कि आपके साथ जो ब्राह्मण हैं, जो मांस खाए बिना नहीं रह सकते हैं, वो कृपया हमारे साथ मत आइए।
तब ये लड़ाई भी चाहते हैं, जब ब्राह्मण मांस खाते हैं, तो यह कैसे संभव है? तो वास्तव में हमें समझना चाहिए कि प्रभुपाद जी भागवत के पहले स्कंध में लिखते हैं, रंतिदेव क्षत्रिय थे, फिर भी वे मांस नहीं खाते थे। तो इसका मतलब क्या है? क्षत्रिय मांस खाते थे, पर वे ऐसे विशिष्ट रूप से खाते थे कि वे मांस नहीं खाते थे।
तो इसका मतलब क्या है कि अभी वैदिक संस्कृति में जो तमोगुण का प्रभाव होता है, ऐसे नहीं है कि तामसिक लोग थे नहीं, तामसिक लोग थे और उनके लिए विधि थी कि आप इस-इस तरह से यज्ञ करके इस तरह से खा सकते हैं मांस। और उनके लिए जो ब्राह्मण थे, वो भी आप मांस खा सकते थे।
पर महाभारत में भी इस रूप से वर्णन है कि धर्म के दो स्तर है और ये कई बार वर्णन आता है सुभद्रा का हरण, यज्ञ-योजन करते हैं और उसके बाद में द्रौपदी का वस्त्रहरण हो रहा था है, तभी चर्चा में दो बार वर्णन आता है कि ये जो है, मांसाहार, नशापान, स्त्रीसंग और जुआ, यह चार चीजें जो हैं, यह व्यक्ति के बुद्धि को नष्ट कर देते हैं और इनके प्रभाव में आकर जो व्यक्ति कार्य करता है, वह बिल्कुल ही मूर्खता के समान कार्य करता है।
इसलिए ये इन चीजों से दूर रहना चाहिए और इन चीजों के प्रभाव में अगर आकर क्या कार्य किया है, तो व्यक्ति उच्च स्तर के धर्म कार्य नहीं कर रहा है, तो समझना चाहिए।
तो क्या है, स्वच्छ रूप से जो उच्चा धर्म है, उच्चा धर्म है, इसका भेद बताने के लिए तो जो यहाँ पर क्या होता है कि जो ब्राह्मणों के प्रति आदर था, वो तामसिक लोगों में भी एक तरह से था। जो राक्षस थे, रावण जैसे, वो भी ब्राह्मणों का आदर करते थे, पर उनकी प्रवृत्ति अलग थी रावण की, उसकी राक्षसी प्रवृत्ति थी और वो कर्मकांड में हो या किसी भाग में श्रद्धा थी, इसलिए उनको आदर दिया गया, उनको भी ब्राह्मण माना गया।
हम देखते हैं कि आठवें स्कंध में जब शुक्राचार्य बली महाराज को प्रथा देते हैं, तो तभी शुक्राचार्य बली महाराज को कहते हैं कि तुम यह विष्णु है, उसको तुम दान मत दो। पर फिर भी उसकी बात में क्या होता है, वास्तव में बली महाराज दान देते हैं, उनको शाप लगता है और सब उच्छिन्न जाते हैं और तुम बली महाराज के बारा गुण नहीं होता है, पर शुक्राचार्य को कभी खंडन नहीं करते हैं, हम शुक्राचार्य की कोई निंदा नहीं करते हैं, विष्णु जो वामन देव के रूप में आते हैं, निंदा नहीं करते हैं, क्योंकि ब्राह्मण जो हैं, उनको आस्तिक्य मतलब अठारहवें अध्याय में देखेंगे, ब्राह्मणों के जो गुण हैं, उसमें आस्तिक्य गुण हैं, भक्तिय गुण नहीं है।
आस्तिक्य के मतलब क्या? नास्तिक नहीं हैं हम, आस्तिक जो बोलते हैं, भगवान में विश्वास है, पर वैदिक संस्कृति में आस्तिक मतलब वेदों में विश्वास है। तो वो ब्राह्मणों को वेदों में विश्वास होता है, पर वेदों के सब ब्राह्मणों को व धर्म में श्रद्धा होती है, कुछ लोगों के अंतर के लिए सर्वश्रद्धा होती है।
तपस्या के तीन प्रकार: शरीर, मन और वाणी का तप
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शरीरं तप उच्यते॥
यज्ञ, तप की चर्चा हो गई। तप की चर्चा करने के पहले भगवान बोलते हैं, यज्ञ तप होता है शरीर, मन और वाणी के लिए हो सकता है।
शारीरिक तप क्या है? सबसे पहले आदर करना। देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं, जो भी आदर दिया बेटी है, उनको उचित पद्धति से आदर देना। यह वास्तव में एक महत्वपूर्ण लक्षण है, किस चीज़ का यह लक्षण है? तपस्या करना, यह एक आदर देने का लक्षण है। देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं… यहाँ पूजां…
तो मैं भी कंप्यूटर पर काम करता हूँ, तो क्या था? कंप्यूटर अगर खराब हो गया, तो बहुत समस्या आ जाती है। तो कुछ भक्तों ने मुझे कहा कि तुम दो कंप्यूटर रख लो, तो क्या होगा? एक कंप्यूटर खराब हो, दूसरा कंप्यूटर ले सकते हैं।
तो मैं सोचता था कि दो कंप्यूटर के बाद यह अत्यार हो जाएगा कि एक कंप्यूटर काफी, दो कंप्यूटर कैसे रखे मैं? तो फिर मैं सोचा कि फिर मैं भक्त समुदाय-महंत से पूछा क्या यह अत्यार हो जाएगा? महंत बोले कि अगर एक ब्रह्मचारी दो कार रखता है, तो वो अत्यार है। वो बोले कि अगर आपको सेवा के लिए जरूरत है, तो वो रख सकते हैं।
तो कैसे है कि अगर किसी चश्मे है, चश्मे के बिना अंधापन जैसा हो जाता है, तो अगर चश्मा खराब हो जाएगा, तो क्या करेंगे? किसे दो चश्मा रखना है, तो वो जरूरी है। तो अभी कोई और भक्त है, उसको सेलफोन की जरूरत नहीं हो सकती है और कोई भक्त हो सकता है, उसको शायद दो सेलफोन की जरूरत पड़ सकती है। तो क्या है, यह हर एक व्यक्ति के सेवा के जरूरत के अनुसार निर्धारित करना पड़ेगा।
समाज सेवा और भक्ति का समन्वय
…बोले बोले नहीं, मैं खाता हूँ अभी दे रहा हूँ अभी भी दे रहा हूँ मैं पर पैसा नहीं दे रहा हूँ। तो क्या है भाव यहाँ था कि वास्तव में हमें शुद्ध भक्ति के प्रचार के लिए लक्ष्मी है वही लिमिटेड में, तो उसको जोर देना है। बाकी सब कार्य अगर करने हैं, तो बहुत से लोग हैं, वो इसमें मदद कर सकते हैं। अकाल हो गया था, तो फिर क्या हुआ? वही लोगों से नहीं कहा अब हम सब कीर्तन करते हैं, उन्होंने क्या किया योजना बनाई जिससे कि अन्न की प्राप्ति हो सके।
उसके लिए हम देखते हैं कि अकाल के बाद रंतिदेव और शिर्बी महाराज, वो तो क्या जानवर भी आ गए थे, उनको भी उन्होंने देना दिया। तो फिर इसमें कुछ भी गलत नहीं है, पर इस तरह से लोगों की शारीरिक जरूरतों को पूरा करना, इसमें कुछ गलत नहीं है।
वास्तव में एक क्षत्रिय की जिम्मेदारी है, पर यह क्या है, यह कौन की जिम्मेदारी है? प्रभुपाद जी ने जब प्रभुपाद जी संस्था चालू की थी, तो वो एक ऐतिहासिक परिस्थिति में चालू की थी। वो ऐतिहासिक परिस्थिति क्या थी कि प्रभुपाद, उनके पहले भक्त संस्था चालू करते हैं, तो उसके पहले उसी समय पाश्चात्य संस्कृति जो थी, पाश्चात्य समाज सेवा में बहुत लग गई कि जो गरीब हैं, उनको समाज सेवा करने हैं।
और तो अभी इस तरह से जब conversion हो रहा था कि जो गरीब लोग थे, उनको अन्न नहीं मिल रहा है, अन्न नहीं, रोटी, कपड़ा, मकान नहीं है, दवाई नहीं है, तो उनको ऐसे भी सब मुफ्त दे के उनको conversion कर रहे थे। तो तभी कई भारतीय हिंदू नेता थे, उन्होंने कहा कि ये जो लोग है, अगर उनको रोटी, कपड़ा, मकान जो जरूरत है, वो नहीं मिल रही है, तो वो सिर्फ प्राप्त करने के लिए उनको क्रिश्चियन के लिए क्या जरूरत है, हम हिंदू के लिए दे सकते हैं, हिंदू लोगों को भी दान देना चाहिए है।
तो इसलिए उन्होंने समाज सेवा में बहुत जोर दे दिया। तो अभी यहाँ क्या है, यह क्षत्रिय कर्तव्य है, यह क्षत्रिय कर्तव्य है, पर जो राजा लोग थे वो कर नहीं रहे थे, तो क्रिश्चियन मिशनरी कर रहे थे, तो वो उसको इस्तेमाल करके लोगों को convert कर रहे थे।
तो कई हिंदू नेताओं ने कहा कि यह हम खुद करेंगे और इससे हम लोगों को conversion से बचा लेंगे, पर जो हिंदू जनसमाज है, उनको दान देने के लिए प्रवृत्त करने के लिए, वो क्या कहने लगते हैं, वो थोड़ा ज्यादा ही बोलते हैं कि आप सब इतने मूर्ख लोग, आप मंदिर में इतना दान देते हो, आपको मंदिर में इतना दान देने की क्या जरूरत है, आप जो गरीब लोग हैं, उनको दान देते हो।
तो इस तरह से बहुत से जो मायावादी नेता हैं, उन्होंने बहुत से क्या किया, बहुत ही गुमराह करने वाले वक्तव्य हैं। जैसे एक मायावादी नेता है, वो कहता है कि आप तुलसी को पानी क्यों देते हो, उससे क्या फायदा होने वाला है? उससे बेहतर है कि आप बैंगन के झाड़ को पानी लगाओ, उससे बैंगन खाने को तो मिलेगा।
नूर को या फिर वास्तव में भारतवासी गाय नहीं खाएंगे, तो गाय भारतवासी को खा देगी। क्या कहने का भावार्थ है कि हम गायों को इतना लक्षण करते हैं, पर जो है मानवों के लिए खाने नहीं देते हैं।
तो यह जो है, इस प्रकार के सेगमेंट जो थे, यह अनुचित है। जो भाव एक तरह से था कि हिंदू संस्कृति का सर्वस्व करना उचित है, पर उस तरह से व्यक्त किया और उन्होंने क्या किया कि जो लोग मंदिर में जाकर इतनी पूजा करते हैं, वो समझते नहीं है कि भगवान सबके हृदय में है और जो लोग समझते हैं कि भगवान सबके हृदय में है, वो सबको दान देंगे, मंदिर में दान देंगे, कुछ जरूरत नहीं है।
तो अभी जो वो माय गॉड मां का मूवी आया था, वो यही भाव से है। तो उसमें क्या है, मानव सेवा ही माधव सेवा है, जन सेवा ही जनार्दन सेवा है, पुरुष सेवा ही पुरुषोंत्तम सेवा है, नर सेवा ही नारायण सेवा है। तो इस तरह से वो करने लग गए।
अभी क्या है, यहाँ जो भाव है, नरैण कूटरी कहा है कि मायावादी शिक्षाओं की एक जोटा बालक है, उससे बहुत ज्यादा क्या फायदा है? तो क्या इस प्रकार की जो भाव था, वो बड़ा खतरनाक है वैदिक संस्कृति की जो भक्ति का मूलभूत तत्त्व है, उसके लिए। तो इसकी प्रतिक्रिया में हमारे आचार्य में क्या बताया है कि जो आध्यात्मिक संस्था है, जो आध्यात्मिक गुरुजन है, उनको इस प्रकार की समाज सेवा में लगने की जरूरत नहीं है।
कि देखो समाज सेवा गलत नहीं है, समाज सेवा यह क्षत्रिय कर्तव्य है और यह एक भौतिक कर्तव्य है। आध्यात्मिक संस्था को इसमें लगने की जरूरत नहीं है, तो इसका मतलब नहीं कि समाज सेवा बुरी है।
पर अगर कोई समाज सेवा है कि समाज सेवा यह भक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण है, जो भक्ति करते हैं, मंदिर में आके दान देते हैं, वो मूर्ख हैं, जो गरीब लोगों को दान देते हैं, वो असली में बुद्धिमान हैं, बुद्धिमान मतलब आध्यात्मिक संस्था अधिक प्रगतिशील है क्योंकि वो गरीब लोगों के हृदय में नारायण को देख रहे हैं।
तो यह ज्यादा भाव था, ज्यादा बहुत ही खतरनाक था और उससे अधिक संस्था प्राणांत मतलब है। इसलिए भक्तशिरोमणि शिला प्रभुपाद, उन्होंने इस प्रकार की समाज सेवा की निंदा की है। इस प्रकार की समाज सेवा मतलब to depict social service as higher than devotional service, यहाँ गलत है।
इसलिए क्या है कि आध्यात्मिक संस्था को आध्यात्मिक ज्ञान देना चाहिए और आध्यात्मिक संस्था, आध्यात्मिक गुरुजन जो है, उनकी प्रेरणा से एक क्षत्रिय समाज बनना चाहिए और क्षत्रिय समाज सेवा करेंगे, इस प्रकार का division of labour होना चाहिए, मतलब कार्यों का विभाजन होना चाहिए। अगर आध्यात्मिक संस्था समाज सेवा करेंगे, तो आध्यात्मिक ज्ञान देगा वो, क्षत्रिय समाज सेवा तो आध्यात्मिक ज्ञान नहीं देना चाहिए।
तो इसलिए जो समाज सेवा है, वह अनुचित नहीं है, पर इस्कॉन को directly नहीं करना चाहिए। तो अभी बॉम्बे में मिड डे मील चालू हो गया था, तो जैसे महादानार महाराज मिलने आए थे और उन्होंने बोला कि आपको ऐसे नहीं करना चाहिए, कई घंटों तक चर्चे थे और फिर जैसे महादानार महाराज ने फिर उसके बारे में क्या किया, हम मंदिर में कुछ भी नहीं करेंगे, अगर देखते हैं राधा-गोविन्द मंदिर में जा के तो वहाँ पे कहीं भी मिड डे मील का एडवरटाइजिंग भी नहीं है और साथ-साथ क्या है कि वो जो है डायरेक्टली मंदिर के लक्ष्मी उसमें इन्वॉल्व नहीं है, मंदिर के भक्त उसमें इन्वॉल्व नहीं है, मंदिर के भक्त मतलब ब्रह्मचारी उसमें इन्वॉल्व नहीं है।
मतलब क्या है, जो चीजें डायरेक्टली शुद्ध भक्ति का प्रचार करने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है, पर अगर ऐसे कोई लोग है, जो पहले से समाज सेवा करने की बहुत प्रेरणा है, अगर मान लीजिए कोई व्यक्ति है, वो शिक्षक है और उसको बहुत इच्छा है कि मैं शिक्षण करना चाहता हूँ, पर जो बालक हैं, गांवों में हैं, उनको शिक्षण देना चाहता हूँ, तो अगर ऐसा व्यक्ति भक्त बन जाएगा, तो क्या उसको शिक्षण के रूप में नहीं करना सही कार्य? नहीं, he can be a teacher, but he can also teach devotional things.
इस तरह से जो भक्त है, अगर कोई व्यक्ति समाज सेवा करने का बहुत उसमें जोश है, तो उनको भक्ति के साथ-साथ समाज सेवा कर सकते हैं। प्रभुपाद जी स्वीकृति के साथ फेवर लेते हैं कि all these isms can be spiritualized by bringing God in the center.
तो इस तरह से जो हिंसा भी है, अभी कुछ भक्त थे, कारगिल का युद्ध हुआ था, वो भारत सेना में थे और वो युद्ध करने जाने लगे थे, तो वो महाराज जी से मिलने आए थे। तो महाराज जी से कहा कि वास्तव में अभी जो आप युद्ध करने जा रहे हैं, यह राजनैतिक स्तर में युद्ध हो सकता है और आप समझ सकते हो कि आप धर्म की रक्षा करने के लिए युद्ध कर रहे हैं, क्योंकि क्या है कि अगर म्लेच्छों का राज्य हो जाएगा, तो वो विग्रहों की पूजा नहीं करने देंगे और वो वेदों से काफी नाश कर सकते हैं।
तो इसलिए भक्त की चेतना पे निर्भर है, तो इस्कॉन ये मेन संस्था जो है, उसके उद्देश्य ब्रह्मचारी है, ये साधारणतया ऐसे कार्य में नहीं लगेंगे, समाज सेवा हो या क्षत्रिय के रूप में युद्ध हो, इसमें नहीं लगेंगे या राजनीति हो, इसमें नहीं लगेंगे। क्षत्रिय बदल गया, अब आज के लिए समझना चाहते हैं, इस पॉलिटिक्स, डिफेंस और सोशल सर्विस इसमें नहीं लगेंगे, पर इस्कॉन के सिस्टर ऑर्गेनाइजेशन्स हो सकते हैं, इस्कॉन संस्था है जो ऐसा कार्य कर सकते हैं। और जो इससे करेंगे, तो इससे इस्कॉन का सकारात्मक प्रभाव नहीं हो सकता है, क्योंकि लोगों को यह चीजें ज्यादा अच्छी लगती हैं, शुद्ध भक्ति समझ में नहीं आती है, इससे इसके द्वारा भक्ति के ओर आ सकते हैं।
तो यह एक हरी जो नेता होता है इस्कॉन के, उनको यह फैसला करना पड़ेगा कि किस तरह से बैलेंस रहें कि ऐसे कार्य भी होते रहें, पर उसके साथ-साथ जो शुद्ध भक्ति है, वो भी उसका भी प्रचार चलते रहें। आपको प्रचार चलते हैं और इसके बारे में प्रचार चलते हैं…
वाणी का तप (वाङ्मयं तपः)
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
अहिंसा… ओके, ओके, फाइन।
अनुद्वेगकरं वाक्यम्, वाणी की तपस्या क्या है कि इस तरह से बोले कि दूसरों को विचलित न करे। तो पहला लक्षण बता रहे हैं, वो सत्यं नहीं बता रहे हैं, पहले बता रहे हैं कि अनुद्वेगकरं वाक्यम्। सत्यं बोलना चाहिए, पर ऐसे नहीं है कि सत्यं बोलने का सत्य बोलने का कारण लेंगे, हमको अटूट बोलना चाहिए, कुछ को लग रहा था मैं कि truth is always bitter, that is true, but everything bitter is not always true.
कभी-कभी आप कहते हैं, किसी को डाटते हैं और कहते हैं साधु के वचन जो होते हैं, वो क्या होते हैं, तलवार होते हैं, जो सत्य को काटते हैं। तो क्या होते हैं, अगर हम हमको जो परिस्थिति अच्छे से पता नहीं है और हम कुछ गलत समझ के काटते हैं, मतलब जो डाटना नहीं हो, उसको डाट देते हैं, तो वो जो तलवार है, उसके अस्त्यों को नहीं काटेगी, उसके व्यक्तित्व बीच कोई काटते है, उसके व्यक्तित्व… यह वक्त कैसे स्वभाव के है… को क्या होगा, वो व्यक्ति दूर से भागेगा।
इसलिए हमें साधारण दया से शिक्षण वचन नहीं बोलने चाहिए।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
तो कई बार क्या होता है प्रभुपाद जी जो फूल्स और रास्कल्स बोलते हैं, वो क्या होता है, हमारे मिठ्ठ्याकारों को अच्छा लगता है फूल्स और रास्कल्स। तो वो क्या होता है, प्रभुपाद जी को बहुत बात दोहरा देते हैं, पर हम बहुत बात देखते हैं कि प्रभुपाद जी इतने संवेदनशील बात करते हैं। प्रभुपाद जी जब भारत में आए थे पहले बार तो दूसरी बार आए थे…
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।