Improving our chanting – Hindi
Talk at Bhaktivedanta Hospital, Mumbai
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Lecture Summary
- मन और चुनाव (Mind and Choices): मनोवैज्ञानिक शोध के अनुसार, मनुष्य अनजाने में दिनभर में 200 से अधिक छोटे-बड़े चुनाव (जैसे क्या खाना है, कहाँ देखना है) करता है, जिनमें से अधिकांश हमारे अवचेतन (Subconscious) मन द्वारा संचालित होते हैं।
- विक्षेप और एकाग्रता (Distraction & Focus): जब हम जप या ध्यान करने बैठते हैं, तो मन भटकता है। एकाग्रता में तीन मुख्य बातें बाधा बनती हैं: Distraction (बाहरी विक्षेप), Distractibility (मन की विक्षिप्त होने की प्रवृत्ति), और Determination (दृढ़ संकल्प)।
- सात्विक जीवन और बाह्य विक्षेप: बाहरी बाधाओं को कम करने के लिए हमें सात्विक जीवन अपनाना चाहिए और ऐसी शांत जगहों पर जप करना चाहिए जहाँ अनावश्यक उत्तेजना या हलचल कम हो।
- मन का डिफॉल्ट प्रोग्राम (Purification): कंप्यूटर के ऑटो-करेक्ट और डिफ़ॉल्ट ब्राउज़र की तरह ही हमारा मन भी आसक्तियों और संस्कारों का एक सॉफ्टवेयर प्रोग्राम है। भौतिकवादी आदतों के कारण मन बार-बार भौतिक आनंद की ओर भागता है। साधना और भक्ति के माध्यम से हमें इस ‘डिफ़ॉल्ट प्रोग्राम’ को शुद्ध करना होता है।
- शारीरिक कसरत बनाम आध्यात्मिक जप: जिस प्रकार जिम में केवल बिना उद्देश्य के हाथ-पैर हिलाने से शरीर मजबूत नहीं होता, बल्कि सही तरीके से वजन उठाने पर शक्ति बढ़ती है; ठीक उसी तरह केवल यांत्रिक रूप से (बिना भगवान के चिंतन के) जप करने से मन पर बोझ बन जाता है।
- हरिनाम का दिव्य रस: हरिनाम नीरस नहीं है; रजोगुण और तमोगुण से ऊपर उठकर जब चेतना सत्त्वगुण में आती है, तभी हम हरिनाम के वास्तविक दिव्य रस और संपर्क (Point & Circle of Concentration) का अनुभव कर पाते हैं।
Full Transcription
मन पर नियंत्रण और भगवद गीता का आधार
हरे कृष्ण, तो आज हम मन पर नियंत्रण कैसे करते हैं, इसके बारे में भगवद गीता के आधार पर चर्चा करेंगे। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने कुछ संशोधन किया कि लोग जो कार्य करते हैं, उसके बारे में कुछ जागरूक होते हैं। इसका मतलब, उसके लिए लोगों से पूछा गया, “आप क्या खाते हैं?” “खाना खाते समय आप कितने चुनाव करते हैं?” लोगों ने बताने का प्रयास किया कि साधारणतया लोगों का ऐसा था कि 10, 12, 15 ऐसे चुनाव थे। पर जब वास्तव में उन्होंने दिन की पूरीचर्या निकाली, तो साधारणतया जो लोग होते हैं, हर दिन में (यह अमेरिका में सर्वे किया गया था) 227 चुनाव करते हैं।
सचेत और अवचेतन चुनाव
मतलब कैसे चुनाव होता है? अगर हम रास्ते पर जा रहे हैं, कोई दुकान दिख रहा है, तो उसमें कुछ खाना है या नहीं? या कोई विज्ञापन देखते हैं, जहाँ कोई खा सकते हैं। तो वास्तव में मतलब 200 से अधिक चुनाव जो होते हैं, वो कर रहे थे लोग, पर उनको पता ही नहीं था कि मैं यह चुनाव कर रहा हूँ। देर आर कॉन्शियस एक्शन्स और देर आर सबकॉन्शियस एक्शन्स। तो ऐसे कार्य हैं, जो हम सचेत होकर करते हैं और जो ऐसे अनेक कार्य हैं, जो हम अचेत होकर, अपने आप रूप से कर लेते हैं।
साधारणतया अभी मैं यहाँ पर बैठा हूँ, तो जब मैं बैठा हूँ, तो किस तरह से बैठूँगा? पीठ बिल्कुल खड़ी करके बैठूँगा या थोड़ा आगे झुक कर बैठूँगा? पैर कैसे रखूँगा? हाथ कहाँ रखूँगा? यह सब चुनाव हैं, यह सब भी निर्णय हैं। पर यह सब निर्णय जो हैं, यह हम हमारे सचेत मन से नहीं करते हैं। यह जो हमारा सबकॉन्शियस, अवचेतन मन (सचेत मतलब कॉन्शियस, अवचेतन) कई बार जप करते हैं, जब हम भक्ति करने का प्रयास करते हैं, कई बार हमें लगता है—अरे, जप में मन ही नहीं लग रहा है, मैं ध्यान लगाने का प्रयास कर रहा हूँ, पर मन सारा दुनियादारी में घूम रहा है। तो ऐसे जप का कुछ फायदा है क्या?
आत्म-जागरूकता और विक्षेप (Distraction)
तो वास्तव में, अपनी अवेयरनेस को, सेल्फ-अवेयरनेस है, मतलब अगर मैं अच्छी चित्तवृत्ति से कुछ कार्य कर रहा हूँ और अगर मैं उसके बारे में सचेत हो जाता हूँ, तो यह भी एक स्तर की स्वचेतना है, स्वजागरूकता है। तो साधारणतया हमारा मन इधर-उधर अनेक जगहों पर घूमता है और जब इस तरह से इधर-उधर मन घूमता है, तो कई बार हम भी उसके साथ घूमने चले जाते हैं।
पर अगर हम मन को नियंत्रण करने का प्रयास कर रहे हैं, मन को एकाग्र करने का प्रयास कर रहे हैं और अगर वो मन एकाग्र नहीं होता है, तो इसमें भी वास्तव में हम जंग में उतर तो गए हैं, हम संघर्ष करने लग गए हैं और यह भी एक स्तर की चेतना है, स्वजागरूकता है। तो वास्तव में एक है distraction, जो बाहर से हमारी चेतना विक्षिप्त करते हैं और फिर दूसरे हैं कि हमारे मन की distractibility, जो विक्षिप्त होने की प्रवृत्ति जो है और तीसरा है हमारा determination, थोड़ा संकल्प। तो determination, distractibility और distraction यह तीन चीज़ें हैं।
बाहरी विक्षेप और सात्विक जीवन
Distraction मतलब जो बाहर से अलग-अलग प्रकार की चीज़ें आते हैं, जो हमारे चेतना को इधर-उधर ले जाते हैं। साधारणतया, हम यहाँ पर बैठे हैं और अचानक कोई अलार्म की ध्वनि आ जाती है बीच से, तो फिर हम सबका ध्यान उधर चला जाएगा। तो यह जो है, distraction, यह बाहर से कोई ऐसी चीज़ आ रही है, जो हमारी चेतना को इधर-उधर ले जा रही है।
और ऐसी जो चीज़ें हैं, उनको कम करने के लिए जो हम हमारे जीवन को जितना सात्विक बना सकते हैं, उससे यह जो विक्षेप है, वह कम हो सकता है। जो बाहर से जो चीज़ें हैं, उनको हम जितना कम कर सकते हैं, तो यही सबसे पहले जो distraction हैं, उनको हम कम कर सकते हैं। अगर हम जप कर रहे हैं, तो ऐसी जगहों पर हम जप करते हैं जहाँ पर ज़्यादा कुछ बाहर नहीं हो रहा है। तो अगर बहुत कुछ हो रहा है और वहाँ हम जप करते हैं, तो हर जगह नई-नई चीज़ें देखते हैं। पर एक ऐसी जगह चलते हैं जहाँ बाहर से ज़्यादा कुछ देखने के लिए नहीं है, तो फिर बाहर से जो विक्षेप है, जो distraction है, वो कम हो जाते हैं।
मन के डिफॉल्ट प्रोग्राम और शुद्धिकरण (Purification)
तो अभी ऐसे समय में मन के सामने दो पर्याय हैं—एक है कि जिस चीज़ पे हम ध्यान देना चाहते हैं, उस पर वो ध्यान देता है या मन अपनी ही दुनिया में चला जाता है। जब अपनी ही दुनिया में चला जाता है, तो मन के स्तर पर हम घूमते हैं इधर-उधर। अभी जो मन के स्तर पर हम घूमते हैं, वो वास्तव में जो हमारे मन पे संस्कार हुए हैं, उनके अनुसार हम घूमते हैं।
जब हम कहते हैं हमें शुद्धिकरण करना है, तो शुद्धिकरण का अर्थ क्या है? वास्तव में Purification means to change the mind’s default programming. तो हमारा मन है, उसकी अपनी ही प्रक्रिया होती है, उसका ही अपना ही प्रोग्राम होता है। अगर मान लीजिए अगर आप कंप्यूटर इस्तेमाल कर रहे होते हैं, कंप्यूटर में ब्राउज़र्स होते हैं, जिससे हम इंटरनेट में जाके अलग-अलग साइट्स को देखते हैं। तो अगर कई साइट्स, जहाँ हम बार-बार जाते हैं, तो वो जो साइट्स होते हैं, वो हमारे डिफॉल्ट में आ जाते हैं।
कंप्यूटर ऑटो-करेक्ट और मन की आदतें
तो अगर मैं कोई साइट पे जाता हूँ, बार-बार अगर मैं ‘IND’ टाइप करता हूँ, मेरे Google Search में, अगर मैं बाद में टाइप करता हूँ—इंडोनेशिया, तो मैं नहीं जा रहा हूँ, मैं इंडोनेशिया पे चल के जा रहा हूँ। जैसे ही मैं ‘IND’ दबाता हूँ, तो तुरंत इंडिया आने वाला आ जाता है। तो ये क्यों हो रहा है घटा है? ये इसलिए है कि वो डिफॉल्ट प्रोग्राम बन गया है।
मैं जब लिखता हूँ, तो एक ऐसा सॉफ़्टवेयर है, जो भी लिखा है वो पढ़ के निकालता है, ताक़त वो सुन सकते हैं, हम उसके प्रूफ रीडिंग कर सकते हैं। तो मैंने एक बात लिखा था, प्रपन्न तो सचितनंत था। तो और वो कंप्यूटर ने पढ़ा—प्रपन्न तो सत्योड़ी चितनंत है। तो सत को उसने सैटरडे कर दिया। क्यों? क्योंकि कंप्यूटर में प्रोग्राम ऐसा था कि जब ‘सैट’ आता है, तो वो शॉर्ट फॉर्म है सैटरडे का। तो इसलिए यह कंप्यूटर जो कर रहा है, तो इसको ऑटो-करेक्ट कहते हैं। कंप्यूटर को लगता है यह गलत है और मैं इसको सही कर रहा हूँ। सैटरडे को सैटरडे करना चाहिए।
पर वास्तव में ऑटो-करेक्ट इसे इनकरेक्ट है। तो मैंने सही शब्द लगाया था, पर उसने सैटरडे कर दिया। तो मैं यह क्यों बता रहा हूँ? यह ध्यान के उदाहरण दे रहा हूँ। इसलिए कि हमारा जो मन है, यह वास्तव में कई पद्धतियों से एक सॉफ़्टवेयर प्रोग्राम, सॉफ़्टवेयर सिस्टम के समान है। तो हमारे मन में कई जो चीज़ें हैं, वो अगर डिफॉल्ट प्रोग्राम्स बन गई हैं। जो हमारे डिफॉल्ट प्रोग्राम्स हैं, उसको हम आध्यात्मिक भाषा में हमारी आसक्तियों के लिए हैं, मेरे अटैचमेंट्स के बारे में हैं।
भौतिकवादी आनंद और आध्यात्मिक संतुष्टि
तो जो हमारी आसक्तियाँ हैं, उसकी ओर हमारा मन स्वाभाविक रूप से अपने आप चला जाता है। हम भले ही प्रयास न करें, फिर भी मन चला जाता है। वास्तव में प्रयास करना पड़ता है क्योंकि हमारा मन उधर-उधर जा रहा है। जैसे कंप्यूटर में जो होता है कि अगर हम कोई, जैसे मैं बोल रहा था, साइट होती है, तो साइट में जब बार-बार जा रहे हैं, तो अपने आप वो साइट आ जाती है।
और अगर मुझे इंडोनेशिया सर्च करना है और वो मेरा ‘इंडिया’ टाइप हो गया है, तो मुझे ‘इंडिया’ को करेक्ट करना पड़ेगा। और यह जो इसको मैं करेक्ट करता हूँ, इसको बदलता हूँ, परिवर्धित करता हूँ, तो ऐसा अगर मैं बार-बार करते रहूँगा, तो फिर क्या होगा? अगर बार-बार मैं इंडोनेशिया ही सर्च कर रहा हूँ, तो वो कंप्यूटर पकड़ लेगा और जब कंप्यूटर पकड़ लेगा, तो बाद में जब मैं ‘IND’ दबाऊँगा, तो वो इंडोनेशिया आ जाएगा।
तो ठीक उसी तरह से, हमारी जो आसक्तियाँ हैं, बहुत समय से हम उसी चीज़ों के बारे में सोचते हैं—इंडोनेशिया है, धन है, ऐश्वर्य है, मान-सम्मान है, ऐसी चीज़ों के बारे में हम सब की अपनी-अपनी आसक्तियाँ हैं, उसके बारे में हम सोचते रहते हैं। अगर हम सोचते रहते हैं, तो उसका प्रभाव यह होता है कि जैसे ही हमारे मन को कुछ कार्य नहीं होता है, मतलब हम थोड़ा सा कुछ कार्य करने जाते हैं, तो तुरंत मन उसे ले आता है। तो साधारण है, जो मन है, जब भौतिकवादी होता है, तो मन सोचता है कि मुझे आनंद प्राप्त करना है, मतलब आनंद मतलब भौतिक आनंद है, भौतिक स्तर।
तो वास्तव में ऐसे नहीं है। अगर हम भक्ति में लगते हैं और हम भक्ति कार्य में लगते हैं, तो हम स्वयं अनुभव करते हैं कि अगर हम तीर्थ में, कथा में लगते हैं, सेवा में लगते हैं, तो उसमें भी एक अलग प्रकार की संतुष्टि है, वास्तव में ऊँचे प्रकार की संतुष्टि है। पर जो मन है, बहुत समय से उस पर ऐसे संस्कार आ गए हैं, इसलिए कि मन यह सोचता है कि मुझे आनंद मतलब भौतिक आनंद ही है। तो इसलिए हम सब आनंद के बिना नहीं रह सकते हैं। जब हम आनंद की खोज करते हैं, उस समय अगर हम सचेत नहीं रहते हैं, तो फिर हम भौतिक आनंद की ओर उठ जाते हैं।
वजन और स्वास्थ्य की चेतना
तो आजकल जो समाज है, उसमें जो लोग अपने वजन के बारे में बहुत ही चिंतित रहते हैं—जो शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अगर वजन बहुत ज़्यादा है, तो वो अच्छा नहीं है। पर जितने लोग चिंता करते हैं वेट कॉन्शियसनेस की, वह बहुत अधिक है। और यह इसलिए है, साधारणतया, कि अलग-अलग संस्कृतियों में जो सौंदर्य की परिभाषा होती है, वो अलग होती है। ऐसे नहीं है कि वही चीज़ों को सौंदर्य हर एक संस्कृति में बताया जाता है, हर एक समय बताया जाता है।
तो आजकल के समाज में, अगर कोई व्यक्ति बहुत ही स्लिम, दुबला-पतला है—स्लिम इस पॉजिटिव कनोटेशन, दुबला-पतला अगर कोई है, तो उसको सौंदर्य माना जाता है। तो जो है, आजकल के समाज में लोग दोनों तरह से चकड़ जाते हैं। अब जानते हैं कोई मुझे इधर से खींच रहा है, कोई मुझे उधर से खींच रहा है। तो अगर दोनों तरफ से खींच रहा है, तो बहुत ही कठिन परिस्थिति हो जाती है।
तो आज का समाज कैसे है? कि सौंदर्य मतलब अगर आपको अच्छा दिखना है, तो आप बहुत दुबले-पतले रहेंगे, नेचुरल फिजिक अगर अच्छा दिखना है। और दूसरा है कि आजकल के समाज में जो अन्न है, फूड है, उसका भी बहुत… ये खाओ, ये खाओ, ये खाओ और ऐसा दिखो, ऐसा दिखो। अब ये दोनों नामुमकिन हैं। क्योंकि जो फूड, जो अन्न है, आजकल जिस प्रकार के अंदर करते हैं, जो फास्ट फूड है, आजकल जिस प्रकार के अंदर करते हैं…
जप का अभ्यास और आध्यात्मिक शक्ति
जब हम बहुत रजोगुण में होते हैं, रजोगुण में हम जप के अक्षर बोलते रहते हैं, तो क्या होता है? बाहर से ऐसे मान लीजिए, कोई सोचता है कि यह वजन उठाने की बहुत परेशानी होती है, बहुत शक्ति लगानी पड़ती है, तो व्यक्ति वो जाता है जिम्नेशियन में, जहाँ पर कसरत करता है। वो सिर्फ हाथ ऊपर-नीचे करने से कुछ ज़्यादा तंदुरुस्ती नहीं बढ़ने वाली है। और अगर कोई सिर्फ हाथ ऊपर-नीचे रोज करते रहता है, पर देखे ना उससे क्या फायदा हो रहा है, तो उससे क्या होगा? बाद में वो बोलेगा कुछ फायदा नहीं हो रहा है, तो उसको पहले तो बोरिंग लगने लग जाएगा, फिर बाद में बोझ लगने लग जाएगा, फिर बाद में वो छोड़ेगा उसको।
ठीक उसी तरह से, जब हम जप करते हैं, जब भगवान श्री कृष्ण को हम हमारी चेतना में उनको भुला रहे हैं, वो जब आते हैं, तो भगवान के बारे में चिंतन करना मतलब वास्तव में एक बड़े वजन के समान है, उसको उठाने के समान है, उसमें थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है। पर जब हम वजन उठाते हैं, उससे हमारी शक्ति बढ़ती है; उसी प्रकार जब भगवान के बारे में चिंतन करते हैं, उससे हमारी आध्यात्मिक शक्ति, हमारी अंतरंग शक्ति बढ़ती है।
पर अगर हम जैसे कोई व्यक्ति सिर्फ हाथ ऊपर-नीचे करते जा रहा है, वैसे हम जप करते हैं, पर भगवान के बारे में विचार नहीं करते हैं, तो क्या है? वो सिर्फ हाथ ऊपर-नीचे करने के समान है। जब इस तरह से हम सिर्फ हाथ ऊपर-नीचे करते हैं, सिर्फ हम जुबान से जप करते रहते हैं, मन लगाने का प्रयास नहीं करते हैं, तो फिर हमें यह जप है, वो एक बोझ बन जाएगा। और फिर बारे में कहते हैं कि क्यों मैं समय व्यर्थ करता हूँ?
तो इसलिए अगर ऐसे लगने लगता है कि जप एक बहुत बड़ा बोझ लगने लगता है, इसमें जब मैं कुछ रस नहीं लग रहा है, तो ऐसे नहीं है कि हरिनाम में स्वाद नहीं है। ऐसे नहीं है कि हरिनाम का स्वाद प्राप्त करने के लिए हमें अनेक सालों की अनेक जन्मों का शुद्धिकरण लगने वाला है, उसके बाद ही स्वाद मिलने वाला है। हाँ, जो पूर्णतया दिव्य स्वाद है हरिनाम का, उसके लिए काफी समय लगेगा, पर इस स्तर पर भी, अभी इस स्तर पर हैं, उस पर भी हम हरिनाम के रस की थोड़ी सी झलक का अनुभव कर सकते हैं।
और उसके लिए हरिनाम के और हमारी चेतना में जो संपर्क होना ज़रूरी है। और वो संपर्क करने के लिए क्या करना चाहिए? यह हमको जिम्मेदारी के साथ सोचना चाहिए। मतलब मैं एक एंडिंग पॉइंट के साथ उसको विराम देता हूँ कि बता रहा था कि हमारी चेतना साधारणतया रजोगुण या तमोगुण में होती है, हरिनाम दिव्य स्तर पर है। तो अगर हमारी चेतना को सत्त्व गुण में लाते हैं, तो सत्त्व गुण में आता है तो हरिनाम के जो दिव्य हरिनाम से हमारी चेतना का संपर्क शुरू होता है—पॉइंट ऑफ़ कॉन्सेंट्रेशन और दूसरा है सर्कल ऑफ़ कॉन्सेंट्रेशन। पॉइंट ऑफ़ कॉन्सेंट्रेशन मतलब जिस चीज़ पे हमें, कि हमारी चेतना है, हमें एकाग्र होना है। पर अगर वो एक चीज़ पे हमें एकाग्र नहीं हो सकते हैं