What does everything will be achieved by chanting mean? – Hindi
Answer Podcast
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Lecture Summary
यह व्याख्यान इस विषय पर प्रकाश डालता है कि केवल बाहरी रूप से जप करने से ही सब कुछ ठीक नहीं हो जाता, बल्कि जप का वास्तविक उद्देश्य चेतना और हृदय में परिवर्तन लाना है। मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- आंतरिक परिवर्तन और साधना: जप केवल जिह्वा या मन का कार्य नहीं है, बल्कि यह हृदय से जुड़ा होना चाहिए। यदि जप करने से स्वभाव और चेतना में बदलाव नहीं आ रहा है, तो इसका अर्थ है कि जप में एकाग्रता या ध्यान की कमी है।
- सेवा भाव की प्रधानता: जप का मूल आधार ‘सेवा भाव’ है। केवल संख्या बढ़ाने (जैसे 64 या 128 माला) के साथ-साथ वैष्णव गुणों का विकास और भगवान की सेवा में समर्पण होना आवश्यक है।
- समग्र भक्ति संस्कृति: शास्त्रों में भक्ति के नौ प्रकार बताए गए हैं (जैसे श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि)। केवल जप ही नहीं, बल्कि ग्रंथ अध्ययन, मंदिर निर्माण, संकीर्तन और समाज में आदर्श जीवन व्यतीत करना भी हरिनाम की सेवा के ही विभिन्न रूप हैं।
Full Transcriptions
जप और साधना का वास्तविक अर्थ और समग्र भक्ति संस्कृति
सवाल पहला यहाँ भी है कि जब हम जप करते हैं, कोई कई से कहा जाता है कि जप करने से ही सब कुछ ठीक हो जाएगा, सब कुछ सिद्धि प्राप्त हो जाएगी। तो अगर हमारे मन के कोई डिफ़ॉल्ट सेटिंग्स हैं, तो जो आ सकती है, क्या वो केवल हरे कृष्ण जप से सब चली जाएगी, सब ठीक हो जाएगी।
यहाँ पे जब हमारे कृष्ण जप करते हैं, तो जप से सब कुछ हो जाएगी सत्य ही, पर मतलब क्या है, वो जप केवल जिह्वा का कार्य है, मन का कार्य है या हृदय का कार्य है। तो अगर हम जप कर रहे हैं, और हमें वास्तव में देखना है कि परिवर्तन हो रहा है या नहीं बच्चा, जप करने से सब कुछ हो जाएगा, पर जो क्या होने वाला है, उन्हें पता होना चाहिए, उन्हें देखना चाहिए, वो हो रहा है या नहीं बच्चा।
अगर मेरे चेतना में परिवर्तन नहीं हो रहा है, तो उसका मतलब है मैं जप कर रहा हूँ, पर जप में ध्यान नहीं लगा रहा हूँ। तो उसके कारण, जैसे दवाई मुँह में तो रह रही है, पर वो बालक के पेट में नहीं जा रही है, बालक के तरफ़ घूमते रह रहा है। अगर हम जप कर रहे हैं, पर उससे परिवर्तन नहीं हो रहा है, तो उससे परिवर्तन होना चाहिए, और वो होगा।
पर कई बार, ऐसे हमारे मन में ब्लॉक्स होते हैं, हमारे मन में कैसे होते हैं, कि हम बाहर से जप करते रहते हैं, पर वास्तव में जप नहीं हो रहा है। उससे कई बार ऐसे हो सकता है कि हम जप कर रहे हैं, पर हमारा जप उससे हमारे आत्मा को संतुष्ट नहीं होगी, तो कुछ अगर ब्लॉक है, तो हमें देखना चाहिए।
जप एक पद्धति है और उसका फल
तो इसका मतलब यह है कि जप यह एक प्रोसेस है, यह एक पद्धति है और वो पद्धति का फल है। अगर फल जो है, वो आना चाहिए, अगर फल नहीं आ रहा है, तो हमें खुद अनुवेशन करना चाहिए, कि क्यों हो रहा है।
और ऐसे नहीं है कि जो वैदिक संस्कृति या वैदिक शास्त्र थे, उसमें जप यह एक ही कार्य था। हमारे बड़े-बड़े ऋषियों, बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे हुए हैं, अभी महाभारत यह 110,000 वर्स, जो 1,10,000 श्लोकों का ग्रंथ है, यह केवल जप करने से लिखा नहीं गया है। जप है, पर साथ-साथ व्यासदेव जी ने स्वयं लिखा हो, और जो अगाड़ियों हमारे ग्रंथ ‘श्रीमद्भागवतम्’ लिखे हुए हैं, वह उसके लिए उन्होंने चिंतन किया, ब्रह्म तत्वों ज्ञान का चिंतन किया, लिखना है तो व्याकरण का चिंतन किया। तो मेरे है किल्किरन delayed होंगे जेक्कोल कर चाहिए संस्कृति में नृत्य है। संस्कृति में नृत्य है। संस्कृति में ग्रंथ है, संस्कृति में मंदिर है और बहुत सी चीज़ें हैं शास्त्रों में। पराविद्या भी थी और अपराविद्या भी होती है, ज्ञानी था तो ये सब केवल जप से ही नहीं हुआ है। जप है, पर जप कहाँ पहुँच है सोचते थे कि जप से ही सब कुछ होने वाला है तो प्रभुपाद जी ने विश्व भर में प्रचार क्यों किया?
प्रमाण करती है, प्रमाण आसान नहीं है। प्रभुपाद जी वृंदावन में बैठे रहते थे और जप से वहीं में सब कुछ होने वाला है, तो यहाँ पे क्या है हमें खुद अनुवेशन करना है हमारे हृदय का कि मैं जप कर रहा हूँ वो क्या है? सेवा भाव से जप कर कि मुझे जप का भाव है कि मुझे सेवा भाव जागृत होती है और फिर सेवा किस तरह से करनी है वो अलग-अलग दृष्टियों को भगवान उनके स्वभाव के अनुसार और उनके वरिष्ठ मार्गदर्शकों के अनुसार अलग-अलग प्रकार से प्रेरणा देंगे।
सेवा भाव और प्रेरणा
तो जिस प्रकार से हम प्रेरणा मिलते हैं, कुछ भक्तगण सोचते हैं कि बस मैं 64 माला करूँगा या 128 माला करूँगा और उससे उनको प्रेरणा मिल रही है, उससे वास्तव में उनमें वैष्णव गुण जागृत हो रहे हैं, उससे उनका मन शांत संतुष्ट हो रहा है, तो वो अच्छा है।
पर अगर दूसरे भक्तों को इसी और पद्धति से जप अच्छा करते हैं, पर उसके साथ अलग सेवा भी करते हैं, तो वो भी महत्वपूर्ण है। तो हमें शास्त्रों में बताया गया है कि नौ प्रकार की भगति की विधियाँ हैं—प्रह्लादमार्ग श्रवणं कीर्तनं विष्णुस्मरणम्। तो वहाँ पे जब सात दिन परीक्षित महाराज थे, तो केवल उन्होंने जप नहीं किया, उन्होंने श्रवण किया, तत्व ज्ञान का चर्चा किया। अलग-अलग भक्तों ने अलग-अलग प्रकार से सेवा किए हैं।
इसलिए जप का अंडरलाइंग, जप का मूल तत्व है वहाँ सेवा भाव। और वो सेवा भाव के जप होता है, तो उससे सेवा होते हैं। किस प्रकार से सेवा करनी है, बहुत अलग-अलग भक्तों को अलग-अलग प्रकार से प्रेरणा दे सकते हैं। कोई भगत हो सकते हैं जो उनको लगते है भगवान हरिनाम के रूप में आए हैं, मैं भगवान की सेवा करूँगा, मैं इसे इतना अर्पण करता हूँ और मुझे और कुछ करने की ज़रूरत नहीं है, जो भी करना है भगवान करेंगे।
हरिनाम की समग्र सेवा और प्रभाव
पर सही में अगर भगवान को जब हम सेवा भाव से कर रहे हैं, उससे हम भी संतुष्ट हो रहे हैं, उससे हम भी परिवर्तित हो रहे हैं, उससे हमारे वरिष्ठ भी हमसे प्रसन्न हैं, तो तो भी अच्छा है। पर हमें भक्ति की एक पूरी प्रक्रिया दी है और भक्ति की प्रक्रिया से संबंध एक पूरी भक्ति संस्कृति है। और उस सबको हम केवल हरिनाम से प्रेरणा मिल सकती है, तो ऐसे नहीं है कि हरिनाम की प्रेरणा सिर्फ हरिनाम की सेवा में ही रहती है।
हरिनाम का सेवा सिर्फ जप करके हो जाता है? हरिनाम की सेवा हम जो हरिनाम संकीर्तन करने के लिए लोगों को मंदिर बनाते हैं, तो उससे भी होती है। हरिनाम के हमारे जब परिवर्तित होता है और उससे हम एक आदर्श रूप से समाज में रहते हैं, उससे लोग आकर्षित होते हैं, तो वो भी हरिनाम की सेवा है। तो ये इससे हरिनाम की सेवा अलग-अलग पद्धति से होती है।