Mahabharata wisdom 1 – Ashwatthama – Beware of the temptation to punish (Hindi)
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Lecture Summary
यह प्रवचन महाभारत के प्रमुख पात्र अश्वत्थामा के जीवन, उसकी गलतियों और उससे मिलने वाली महत्वपूर्ण सीखों पर आधारित है। मुख्य बिंदुओं का सारांश निम्नलिखित है:
- प्रलोभन और प्रतिकार का सिद्धांत: अश्वत्थामा का जीवन यह दर्शाता है कि दूसरों को सज़ा देना या उसका प्रतिकार करना भी एक खतरनाक प्रलोभन (Temptation) हो सकता है। प्रतिकार हमेशा उचित मात्रा में होना चाहिए, अन्यथा वह हिंसा और विनाश का रूप ले लेता है।
- अश्वत्थामा का बचपन और द्रोणाचार्य का संघर्ष: अश्वत्थामा का बचपन अत्यंत गरीबी में बीता। एक बार दूध के अभाव पर माँ द्वारा आटे का घोल पिलाए जाने के प्रसंग से व्यथित होकर द्रोणाचार्य ने शस्त्र शिक्षा देने का निर्णय किया और बाद में हस्तिनापुर में कौरव-पांडवों के गुरु बने।
- युद्ध का पंद्रहवां दिन और द्रोणाचार्य का वध: युद्ध के दौरान जब द्रोणाचार्य अत्यधिक उग्र हो गए, तब श्रीकृष्ण की योजना के तहत युधिष्ठिर द्वारा “अश्वत्थामा हतो हतः” (नरो वा कुंजरो वा) का अर्द्धसत्य कहा गया। इस मानसिक आघात से द्रोणाचार्य ने अपने शस्त्र त्याग दिए, जिसके बाद धृष्टद्युम्न ने उनका वध कर दिया।
- देश-काल-पात्र के अनुसार सत्य और असत्य (Contextual Truth): प्रवचन में समझाया गया है कि सत्य और असत्य का निर्धारण हमेशा परिस्थिति, देश, काल और पात्र पर निर्भर करता है। नीति के नियम एक ‘टॉर्च’ के समान हैं, जबकि भगवान का आदेश ‘सूर्य’ के समान है। आवश्यकता पड़ने पर धर्म और लोक-कल्याण के लिए इसका विवेकपूर्ण उपयोग किया जाता है।
- नारायण अस्त्र का प्रयोग और पराजय: क्रोधित होकर अश्वत्थामा ने पांडवों पर अत्यंत शक्तिशाली ‘नारायण अस्त्र’ चलाया। श्रीकृष्ण के निर्देश पर सभी सैनिकों ने अस्त्र के सामने समर्पण (दंडवत) किया, जिससे अस्त्र शांत हो गया। इसके बाद अश्वत्थामा और कौरव सेना हताश हो गई।
- सौप्तिक पर्व और घृणास्पद कृत्य: युद्ध के अंत में अश्वत्थामा ने गहरी रात में सोते हुए सैनिकों और पांडव पुत्रों का वध कर दिया, जिसे एक अत्यंत घृणास्पद और अनैतिक कृत्य बताया गया है। प्रकृति पाप और पुण्य दोनों के लिए सुविधा देती है, किंतु मनुष्य को अपनी बुद्धि से सही-गलत का चुनाव करना चाहिए।
- दया और न्याय का संतुलन (प्रश्नोत्तर): प्रवचन के अंत में द्रौपदी द्वारा अश्वत्थामा को जीवनदान देने के प्रसंग के माध्यम से दया और न्याय के संतुलन को समझाया गया है। जहाँ अत्याचारी राजा को दंड देना न्याय और क्षत्रिय का कर्तव्य है, वहीं परिस्थितियों के अनुसार निर्णय करना ही वास्तविक धर्म है।
Full Transcription
महाभारत की विशेष परिस्थितियां और पात्र
हरे कृष्णा! आज तीसरे रविवार को आ रहे होंगे, आप सबका स्वागत है। कई महीनों के बाद आप सबके बीच में आने में, मैं खुद को बहुत भाग्यवान मानता हूँ। तो अगले कुछ हफ्तों में हम महाभारत में जो विशेष कुछ परिस्थितियां हैं, उनके बारे में, कुछ गलतफहमियां हैं उनके बारे में, कुछ नैतिक प्रश्न उठते हैं उनके बारे में चर्चा करेंगे।
तो आज हम महाभारत के अलग-अलग पात्रों के बारे में लेंगे। तो आज मैं अश्वत्थामा के बारे में चर्चा करूँगा और फिर अगले हफ्तों में कर्ण के बारे में, फिर युधिष्ठिर महाराज ने जुआ क्यों खेला, या अगले हफ्ते में देखेंगे कर्ण के साथ अन्याय हुआ या नहीं। उस तरह से हम महाभारत के बारे में अभी चर्चा करेंगे।
तो अश्वत्थामा के जीवन से एक महत्वपूर्ण सीख मिलती है। तो हर एक महाभारत का जो पात्र है उससे हम अलग-अलग चीज़ें सीख सकते हैं। तो हम सब चीज़ों पे जोर नहीं देंगे, हम जीवन के बारे में देखेंगे, पर कुछ प्रधान सीख जो है उसके बारे में हम देखेंगे।
अश्वत्थामा का जीवन और दूसरों को सज़ा देने का प्रलोभन
तो Ashwatthama’s life demonstrates the dangerousness of the temptation to punish others. दूसरों को सजा देना ये भी एक प्रलोभन हो सकता है और यह बहुत खतरनाक प्रलोभन हो सकता है और उस प्रलोभन से लोग बहुत नुकसान कर सकते हैं। दूसरों का बहुत विनाश कर सकते हैं और सोचते हैं कि मैं सही कर रहा हूँ।
तो हम जब जीवन जीते हैं तो अलग-अलग प्रकार से प्रलोभन आते हैं। कुछ प्रलोभन होते हैं जो हमें सही मार्ग से गलत मार्ग ले जाते हैं। काम का प्रलोभन हो सकता है। लोभ का प्रलोभन हो सकता है। पर जब हमारे प्रति कोई अन्याय होता है, और उसका प्रतिकार करना होता है। तो प्रतिकार भी करना है, तो उचित प्रमाण में करना है।
अगर मान लीजिए दो बालक खेल रहे हैं, और एक बालक दुसरे को थप्पड़ मारता है। और दूसरा बालक चाकू निकाल के उसको पेट में घुसा के उसको मार डालता है। तो यह क्या है? यह प्रतिकार बिल्कुल ही उचित मात्रा में नहीं है। तो ठीक उसी तरह से जो अश्वत्थामा के जीवन से महाभारत में दर्शाया जाता है, कि जो किसी पे क्रोध हो जाने पे, और क्रोध भले ही सही हो, तो फिर जब प्रतिकार करना होता है, जब सजा देनी होती है, सजा देना भी एक बहुत ही खतरनाक प्रलोभन हो सकता है।
अश्वत्थामा का बचपन और द्रोणाचार्य का संकल्प
तो अश्वत्थामा का जो वर्णन आता है, उसके बचपन से आता है, तो उसके पिता होते हैं द्रोणाचार्य, वो बहुत गरीब होते हैं। तो एक बार अश्वत्थामा खेल रहा होता है, तो उसके मित्र उससे कहते हैं, छोटा बालक होता है वो, कि आज मेरी माँ ने मुझे दूध दिया, बड़ा स्वादिष्ट था दूध। और ऐसे कहते हैं, दूध जो है, ये इस भौतिक जगत, इस पृथ्वी का अमृत के समान है। तो अश्वत्थामा, उसका परिवार इतना गरीब होता है, तो वो अपनी माँ को आके पूछता है, “माँ दूध क्या होता है?”
तो उसकी जो माँ होती है, उसकी आँखों से आंसू आते हैं, वो कहती है, कि वो क्या करती है, अपने घर में थोड़ा आटा होता है, सफेद होता है आटा, उसमें शक्कर डालती है, पानी डालती है, और उसको पिलाती है, कहती है, “ये दूध है, ये पी लो आप।” तो और वो पीता है, दूध है, वो कहती है, कि ये बहुत अच्छा है।
तो जब ये प्रसंग द्रोणाचार्य को पता चलता है, तो उन्हें बहुत दुख होता है, और तब तक वो ब्राह्मण की वृत्ति से जी रहे होते हैं, दान के आधार पर। पर तभी वो फैसला करते हैं, कि वैदिक शास्त्रों में जो ब्राह्मण होते हैं, उनको सब वर्णों के बारे में ज्ञान होता है। तो ब्राह्मण जो होते हैं, कुछ ब्राह्मण होते हैं, उनको शस्त्रों का ज्ञान होता है, पर साधारणतया जो ब्राह्मण होते हैं, वह शस्त्रों का उपयोग नहीं करते हैं। पर क्योंकि द्रोणाचार्य ऐसी विषम परिस्थिति में थे, इसलिए उन्होंने फैसला किया, कि “मैं जो शस्त्र का ज्ञान है, वह सिखाऊंगा।”
और फिर वह अपने घर से निकल पड़े, और हस्तिनापुर में आये। वहाँ पे, द्रोणाचार्य के पूरे जीवन में हम नहीं जाएंगे कि ये मेरे गुरु भाई हैं, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, दोनों एक तरह से परशुराम के शिष्य थे, युद्ध शैली में। तो फिर उन्हें नियुक्त कर दिया गया, पांडवों और कौरवों के शिक्षक के रूप में। और तभी उन्होंने हस्तिनापुर के बाजु में एक जगह दे दी, जो वहाँ पे उन्होंने अपना गुरुकुल बना लिया। और वह गुरुकुल बहुत प्रसिद्ध हो गया, इतना प्रसिद्ध हो गया कि वहाँ पे बहुत अलग-अलग देशों से राजा अपने राजकुमारों को भेजते थे। वह द्रोणाचार्य के गुरुकुल की जगह है, गुरु-गांव से गुड़गांव हो गया वो नाम।
कुरुक्षेत्र युद्ध और द्रोणाचार्य का सेनापति बनना
तो अश्वत्थामा यह भी अपने गुरु के आश्रम में शिक्षण प्राप्त करते थे और द्रोणाचार्य का अपने पुत्र से बड़ा स्नेह था और अश्वत्थामा यह बड़े अच्छे शिष्य थे। बड़े अच्छे योद्धा बने वो और फिर अश्वत्थामा ने अच्छे शिक्षण प्राप्त कर लिया। तो जब युद्ध हुआ, अश्वत्थामा की मैत्री पांडवों और कौरवों दोनों से थी। और जब द्रौपदी का वस्त्रहरण हुआ, वो असत् सभा हुई पूरी जिसमें जुआ खेल के युधिष्ठिर महाराज से सब कुछ छीन लिया गया, तब अश्वत्थामा उस सभा में नहीं था।
और अश्वत्थामा को बाद में तो बड़ा क्रोध आया पर क्योंकि बाद में 14 साल के बाद, 13 साल के बाद जब युद्ध हुआ तो क्योंकि द्रोणाचार्य जो थे कुरु वंश के नियुक्त अधिकारी थे और इसलिए उनको कौरवों के पक्ष से युद्ध करना पड़ा और अश्वत्थामा भी अपने पिता जी के पक्ष से युद्ध करने लग गया। और काफी भीषण युद्ध किया अश्वत्थामा ने, बहुत ही शक्तिशाली योद्धा था।
और जब दसवें दिन तो युद्ध जो हुआ अठारह दिन तक युद्ध चलता था जैसे आपको पता है तो उसमें पहले दस दिन जो थे भीष्म पर्व जो है। द्रोण पर्व और द्रोण पर्व जो है अगले पाँच दिन का युद्ध उसमें बताया गया। ग्यारहवें से पंद्रहवें दिन जिसमें द्रोणाचार्य सेनापति थे। फिर उसके बाद में कर्ण पर्व आता है जिसमें सोलहवें या सत्रहवें दिन के लिए कर्ण सेनापति थे। फिर उसके बाद में पर्व आता है नौवां पर्व है शल्य पर्व जिसमें शल्य एक दिन के लिए सेनापति थे। बाद में जो पर्व आता है उसे सौप्तिक पर्व कहते हैं। तो उस समय अश्वत्थामा को दुर्योधन ने सेनापति बनाया था।
पर क्योंकि अश्वत्थामा ने इतना घृणास्पद कार्य किया उस समय तो इसलिए वो पर्व का नाम उसके नाम पर नहीं दिया गया है। बाकी सब सेनापति थे उनके अनुसार। अभी जो पांडवों के सेनापति थे धृष्टद्युम्न, ना उसके नाम पे कोई पर्व नहीं है। जो कोई भी पांडवों के नाम पे एक भी पर्व नहीं है। तो जो कौरवों के सेनापति थे उनको विरोध करके उनको हराना था वह महत्वपूर्ण था उस प्रसंग में। तो उनके नाम पे पर्व आ गया है। पर जो अश्वत्थामा जो सेनापति थे तो उसको सौप्तिक पर्व नाम दिया है। सौप्तिक मतलब सोना। तो अश्वत्थामा ने सोते समय जो पांडवों के सेनापति और सैनिक थे उनका वध किया। तो यह प्रसंग पे हम जायेंगे, हम सौप्तिक पर्व पे आज जोर देने वाले हैं क्योंकि उसमें हम अश्वत्थामा के जीवन के बारे में समझ सकते हैं।
युद्ध का पंद्रहवां दिन और युधिष्ठिर का अर्द्धसत्य
पर उसके पहले हम जो सातवां पर्व है द्रोण पर्व में जाते हैं। तो भीष्म पर्व के अंत में जब भीष्म की मृत्यु होने वाली होती है अर्जुन और शिखंडी दोनों आक्रमण कर रहे होते हैं। तो द्रोणाचार्य कहते हैं अपने पुत्र से कि हे अश्वत्थामा अभी ऐसा समय है कि जो पुत्र है उसको अपने स्वयं के जीवन की परवाह नहीं करनी चाहिए और अपने वरिष्ठों के संरक्षण के लिए अपना जीवन भी त्याग देना चाहिए। इसलिए जाओ और जो पार्थ है उसको भीष्म तक पहुँचने मत दो। तभी अश्वत्थामा पूरी शक्ति से प्रयास करते हैं। अश्वत्थामा, दुशासन सब भीष्म पितामह का संरक्षण का प्रयास करते हैं पर अर्जुन शिखंडी के साथ भीष्म पितामह को तीरों के बिस्तर पे गिरा देते हैं।
फिर द्रोणाचार्य सेनापति बनते हैं और द्रोणाचार्य सेनापति बनते हैं तो द्रोणाचार्य उनको सेनापति बनाने के बाद वर मांगता है कि आप युधिष्ठिर को ज़िंदा गिरफ्तार करके लेके आओगे। तो द्रोणाचार्य को पहला आश्चर्य होता है कि ज़िंदा क्यों गिरफ्तार करना है? तो अगर उसको मार डालेंगे तो युद्ध खतम होगा। तो फिर दुर्योधन कहता है कि मैंने देख लिया है कि दस दिन तक जिससे युद्ध हुआ है मैं समझ गया ये पांडवों को कोई नहीं हरा सकता है युद्ध में। तो मेरी योजना है कि अगर हम युधिष्ठिर को गिरफ्तार कर लेंगे तो पुनः उसको मैं जुए के लिए चुनौती दे दूंगा। और जुए के लिए चुनौती दे के वापस तेरा साल वनवास भेज दूंगा। तो द्रोणाचार्य सिर हिलाते हैं कि तुम कभी सीखोगे नहीं।
तो फिर ग्यारहवें दिन बड़ा भीषण युद्ध होता है। द्रोणाचार्य युधिष्ठिर महाराज के रथ को तोड़ देते हैं, उनका कवच होता है उसको तोड़ देते हैं। और उनको गिरफ्तार ही करने वाले होते हैं तभी पार्थ आ जाते हैं वहाँ पे और उनको रोक देते हैं। अगले दिन द्रोणाचार्य पुनः युद्ध करते हैं पर वह कहते हैं कि अगर अर्जुन बीच में आएगा तो मैं द्रोणाचार्य महाराज युधिष्ठिर को गिरफ्तार नहीं कर पाऊंगा। तुम अर्जुन को कहीं और लगा दो। तो सुशर्मा नाम का एक राजा होता है संशप्तक का राजा, तो वो कहता है कि मैं अर्जुन को चुनौती देकर दूसरी जगह ले जाऊंगा। तो दूसरे दिन भी द्रोणाचार्य भरसक प्रयास करते हैं पर फिर भी पांडवों के धृष्टद्युम्न आदि सेनापति वही सब द्रोणाचार्य को रोक लेते हैं।
दुर्योधन का क्रोध और अश्वत्थामा का उत्तर
तभी दुर्योधन अश्वत्थामा के पास जाता है और वो द्रोणाचार्य को कोसने लगता है। वो कहता है कि ये मेरा दुर्भाग्य है कि मेरे सारे सेनापति जो हैं वो पांडवों से ज़्यादा स्नेह करते हैं मुझसे। मुझसे इतना स्नेह नहीं करते हैं जितना पांडवों से स्नेह करते हैं। इसलिए भीष्म ने भी युद्ध नहीं किया और अभी तुम्हारे पिता भी युद्ध नहीं कर रहे हैं।
तो यहाँ सुनके अश्वत्थामा को क्रोध आ जाता है। वह कहता है हे दुर्योधन ये सत्य है कि मेरे पिता और मैं हम दोनों पांडवों से स्नेह करते हैं। वह इतने सद्गुणी हैं कि उनसे स्नेह कौन नहीं करेगा। पर युद्ध में सब स्नेह भूल जाते हैं। मैं देख रहा हूं कि मेरे पिता अपनी पूरी सामर्थ्य से युद्ध कर रहे हैं। क्योंकि तुम अपने अहंकार से अंधे हो इसलिए तुम देख नहीं पा रहे हो। तुम इतने कृतघ्न हो कि तुम खुद के स्वार्थ के अलावा कुछ और देख ही नहीं सकते हो। अर्जुन जैसा योद्धा दूसरे पक्ष में हो तो यश प्राप्त करना आसान नहीं है। तो अश्वत्थामा जो होता है वह दुर्योधन को अपने मन की बात बोलने से हिचकिचाता नहीं है। इसको किसी का डर नहीं होता है और इसको पांडवों का आदर भी होता है।
पर पंद्रहवें दिन जब युद्ध हो रहा होता है तो अश्वत्थामा का युद्ध घटोत्कच के साथ होता है, नहीं घटोत्कच के साथ पहले युद्ध होता है। उस दिन चौदहवें दिन की रात को घटोत्कच का वध होता है। पर पंद्रहवें दिन अश्वत्थामा का अलग-अलग योद्धाओं से युद्ध होता है सात्यकि से युद्ध होता है। तभी अश्वत्थामा घायल हो जाता है और वो निकल जाता है रणभूमि से। और तभी द्रोणाचार्य बड़ा भीषण युद्ध करते हैं और ऐसा लगता है कि वो पांडवों की सेना का विनाश कर देंगे। तो वो प्रसंग विस्तारित है उसको मैं संक्षेप में नहीं बोलूंगा। तभी कृष्ण कहते हैं युधिष्ठिर से हे युधिष्ठिर आज तुम्हें कुछ करना चाहिए जिससे कि द्रोणाचार्य युद्ध करना छोड़ देंगे नहीं तो फिर आज ही युद्ध खतम हो जाएगा और तुम्हारा पराजय हो जाएगा।
अश्वत्थामा हतो हतः – नर या कुंजर
तो युद्ध शुरू होने के पहले जो युधिष्ठिर महाराज होते हैं वह अपने वरिष्ठों से आशीर्वाद लेने के लिए जाते हैं। तो युद्ध जब चालू होने वाला होता है तो दो बार युद्ध रुक जाता है। पहले तो अर्जुन जब कहते हैं कि मैं युद्ध नहीं करूँगा तभी भगवद्गीता बोली जाती है और जब भगवद्गीता खतम हो जाती है अर्जुन तैयार होते हैं युद्ध करने के लिए तभी क्या होता है युधिष्ठिर महाराज अपने रथ से उतर जाते हैं और वो नंगे पैर रथ से उतर जाते हैं पर अपना शस्त्र नीचे रख देते हैं अपना कवच भी निकाल देते हैं। और सारे कौरवों के सैनिक होते हैं वो हंसने लगते हैं ये डर गया और अभी शरणागति होने आ गया है। तो पांडव भी घबरा जाते हैं वो अपने बड़े भाई से कहते हैं कि आप क्या कर रहे हो। पर बिना कुछ ध्यान दिए युधिष्ठिर दूसरे पक्ष की ओर जाते हैं और सब जो अपने वरिष्ठ होते हैं भीष्म, द्रोण, कृपा और शल्य उन चारों से आशीर्वाद लेते हैं।
और फिर तभी युधिष्ठिर महाराज की ये भी ज़िम्मेदारी होती है वो राजा होते हैं। तो फिर उनको पूछते हैं इन सब से भीष्म, द्रोण और कृपा से कि आपको तो पराजित करना नामुमकिन है तो आपको कैसे पराजित किया जा सकता है। तभी द्रोणाचार्य बताते हैं कि मैं जब तक युद्ध कर रहा हूँ या शस्त्र उठा के युद्ध कर रहा हूँ तब तक कोई मुझे हरा नहीं सकता है। पर जब किसी विश्वासपात्र व्यक्ति से मुझे कोई दुखद जानकारी मिलेगी तब मैं मेरे शस्त्र छोड़ दूँगा और फिर उसके बाद मुझे पराजित किया जा सकता है। तो अभी कृष्ण यह युधिष्ठिर महाराज को याद दिला देते हैं। वो कहते हैं कि युधिष्ठिर महाराज आप बताओ द्रोणाचार्य को कि अश्वत्थामा का वध हो गया है।
तो अभी कृष्ण तो अर्जुन के रथ पर ही होते हैं उनके सारथी ही होते हैं। तो अर्जुन कहते हैं हे केशव यह कैसे संभव है हम इस तरह से हमारे गुरु से झूठ कैसे बोल सकते हैं। तो उस समय क्योंकि इतना उग्रता से युद्ध कर रहे होते हैं तो भीम भी वहाँ पर आ गए होते हैं। संवाद चल रहे होते हैं क्या करना है इमरजेंसी मीटिंग (Emergency meeting) होता है वो। तो जब ऐसा मीटिंग हो रहा होता है तो जैसे कृष्ण से वचन सुनते हैं भीम क्या करते हैं तुरंत कौरवों के पक्ष में आते हैं वहाँ पे एक मालवा राजा होता है उसका एक हाथी होता है उसका नाम होता है अश्वत्थामा। और उसको एक प्रहार करते हैं भीम और वो हाथी जो होता है ज़मीन पर साष्टांग सदा दंडवत कर देता है।
तो तभी उसके बाद में भीम तुरंत आते हैं और फिर कहते हैं द्रोणाचार्य से कि अश्वत्थामा की मृत्यु हो गई। तो जब भीम ऐसे बोलते हैं तो भीम की आवाज़ कांपती है फिर भी वो सोचते हैं कि कृष्ण ने बताया है इसलिए मुझे ऐसे करना चाहिए। फिर उसके बाद में द्रोणाचार्य फिर भी जो होते हैं भयभीत हो जाते हैं और फिर उनके पैर जो होते हैं पानी जैसे होने लगते हैं सोचते हैं क्या सत्य है नहीं वो सोचते हैं भीम जो है ये हंसी मज़ाक में कुछ भी कर सकता है। तो इसलिए इसकी बात पर ज़ोर नहीं देना चाहिए और वो युद्ध करते रहते हैं।
द्रोणाचार्य द्वारा दिव्यास्त्रों का प्रयोग और ऋषियों का आगमन
फिर द्रोणाचार्य जब युद्ध करते आते हैं तो वो देखते हैं कि चारों तरफ से बहुत सैनिक आ रहे हैं तो वो दिव्यास्त्र जो होते हैं वो इस्तेमाल करने लगते हैं। अभी जो युद्ध शुरू हुआ होता है शुरू होने के पहले दोनों जो पक्ष के सेनापति होते हैं धृष्टद्युम्न इधर से पांडवों से और भीष्म उधर से कौरवों से तो वो दोनों मिलते हैं और कहते हैं कि हम युद्ध के नियमों का पालन करेंगे। धृष्टद्युम्न कहते हैं कि हम पालन करेंगे तब तक जब आप पालन करोगे। अगर आप उल्लंघन करोगे तो फिर अगर हमारे कोई सेनापति उल्लंघन करेंगे तो हम ज़िम्मेदार नहीं हैं। तो यहाँ पे द्रोणाचार्य वो एक नियम होता है कि दैवी अस्त्र जो होते हैं वो साधारण सैनिकों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं करने होते हैं।
कैसे है यहाँ जो युद्ध होता है क्षत्रिय संस्कृति में वो युद्ध क्या होता है वो एक स्पोर्ट (Sport) के समान होता है खेल के समान होता है जिसमें कि सब अपनी प्रतिभा दिखाना चाहते हैं। तो प्रतिभा दिखाने के लिए कुछ नियमों का पालन करना है। अगर कोई क्रिकेट में खेल रहा है कोई बॉलर बॉलिंग करने आता है और स्टंप्स की जगह पर रुकने पर आके बैट्समैन के सामने मुँह में आके धड़ से बॉल फेंक देता है उसके दांत में, तो फिर क्षत्रियों में नियमों का पालन करना होता है। तो एक नियम होता है कि जो दैवी अस्त्र हैं वो साधारण सैनिकों के सामने इस्तेमाल नहीं करना है। तो जब द्रोणाचार्य ऐसे करते हैं तो पांडवों की सेना में हज़ारों हज़ारों की संख्या में सैनिकों की मृत्यु होती है।
और तभी द्रोणाचार्य के पिता होते हैं भारद्वाज ऋषि और बाकी अलग-अलग ऋषि वो आते हैं आसमान में और कहते हैं द्रोण तुम क्या कर रहे हो यह तुम बड़ा ही पापास्पद कार्य कर रहे हो कि दैवी अस्त्र साधारण सैनिकों के सामने कर रहे हो। अभी तुम्हारा समय आ गया है रुक जाओ अभी तुम युद्ध छोड़ दो। जब द्रोणाचार्य ऐसे सुनते हैं तो उनका मन विचलित होता है। उस समय क्या हो गया होता है एक तो दुर्योधन हमेशा उनको कोस रहा होता है कि तुमको मैं सेनापति बनाया है पर तुम युद्ध नहीं कर रहे हो प्रामाणिकता से तो उससे वो विचलित हो गए हैं। और फिर अश्वत्थामा की मृत्यु का समाचार सुनते हैं भले विश्वास नहीं करते हैं फिर भी उससे विचलित हो जाते हैं। तो इसलिए बिना सोचे वो दिव्यास्त्र इस्तेमाल कर लेते हैं।
द्रोणाचार्य का शस्त्र त्याग और धृष्टद्युम्न द्वारा वध
और फिर जब इस तरह से वो ऋषि उनको डांटते हैं तो वो आक्रमण करने लगते हैं और तीर से आक्रमण करते हैं और उस समय जब कई तीर आके द्रोणाचार्य को लगने लगते हैं तो द्रोणाचार्य भी क्रुद्ध हो जाते हैं और पुनः अपना धनुष बाण उठा के युद्ध करने लगते हैं। और अपना तीर निकालने जाते हैं तो अचानक देखते हैं कि उनका जो तीर होता है तरकश में जहाँ तीर रखने की जगह होती है वह आपके तीर खतम हो गए। तो उनको युधिष्ठिर महाराज बताते हैं कि “अश्वत्थामा हतः इति नरो वा कुञ्जरो वा” कि अश्वत्थामा की मृत्यु हो गई है पर नर है या कुंजर है कौन से अश्वत्थामा की मृत्यु है मुझे पता नहीं है।
तो युधिष्ठिर महाराज जो होते हैं वह पूर्णतया झूठ नहीं बोलते हैं पर तभी क्या होता है जैसे ‘अश्वत्थामा हतो हतः’ बोल लेते हैं तो भगवान कृष्ण अपना शंख बजा लेते हैं। तो वह ‘नरो वा कुंजरो वा’ है वह सुनाई नहीं देता है द्रोणाचार्य को। और फिर द्रोणाचार्य पूरे तरह हताश हो जाते हैं और वह अपने शस्त्र को छोड़ देते हैं और वह कहते हैं अभी दुर्योधन वहाँ पे आ गया था यह देखने कि सेनापति क्या कर रहे हैं। तो फिर वह कहते हैं हे दुर्योधन हे दुशासन हे कर्ण अभी आप युद्ध करो मैं भी युद्ध से निवृत्त हो रहा हूँ। और वह अपनी आँखें बंद करके ध्यान में बैठ जाते हैं और पिता और बाकी सब ऋषि मुनियों में चिंतन करते हैं और जो दिव्य दृष्टि वाले हैं वो देखते हैं कि द्रोणाचार्य तभी ही अपना शरीर छोड़ देते हैं और उनकी आत्मा ऊपर के लोकों की ओर चली जाती है।
और उस समय धृष्टद्युम्न देखता है कि द्रोणाचार्य अपने शस्त्र छोड़ दिए हैं तो वो तेज़ी से अपनी तलवार उठा के द्रोणाचार्य की ओर दौड़ने लगता है और तभी अर्जुन चीखता है कि रुको। तो अर्जुन की योजना क्या होती है जब कृष्ण ऐसे बोलते भी हैं कि तुम द्रोणाचार्य को बोलो कि अश्वत्थामा की मृत्यु हो गई है तो पांडवों की कोई इच्छा नहीं होती है कि द्रोणाचार्य का वध करें। पांडवों की यही इच्छा होती है कि द्रोणाचार्य हमारी सेना का विनाश न करें। तो जब अर्जुन सहमत भी हो जाते हैं जब भगवान कृष्ण बोलते हैं ऐसे करना है तो अर्जुन पहले विरोध करते हैं पर बाद में स्वीकार भी कर लेते हैं।
तो तभी अर्जुन की योजना क्या होती है युधिष्ठिर की योजना होती है कि जब द्रोणाचार्य अपने शस्त्र छोड़ देंगे तो हम द्रोणाचार्य को गिरफ्तार कर लेंगे। और आदर से गिरफ्तार करके हम कैद में रखेंगे जब तक कि युद्ध खतम नहीं हो जाए। और फिर उनको पुनः छोड़ देंगे और फिर युद्ध खतम हो जाए तो वो हमसे आक्रमण नहीं करेंगे। तो अर्जुन धृष्टद्युम्न को कहते हैं उनको रोकने को कहते हैं और धृष्टद्युम्न पूरी तलवार उठा के आता है तो सब योद्धा जो होते हैं देख रहे होते हैं धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्य की शिखा पकड़ लेता है, उनको रथ से खींच लेता है और तलवार उठा के सिर काट देता है।
तो सिर काट देता है यह देखकर कौरवों और पांडवों दोनों के पक्ष से जो लोग होते हैं बड़े ही विचलित हो जाते हैं और सब धृष्टद्युम्न को कोसने लगते हैं। सब धृष्टद्युम्न को डांटने लगते हैं। धृष्टद्युम्न बड़ा ही निष्ठुर भाव से कहता है इसके लिए मैंने जन्म लिया था और किसी भी पद्धति से मुझे पूरा करना था आज मैंने जन्म का उद्देश्य पूरा कर लिया है। और फिर तभी अर्जुन बहुत क्रुद्ध हो जाते हैं या अर्जुन डांटने लगते हैं क्योंकि अर्जुन अपने गुरु के प्रति बड़ा स्नेह रखते हैं। और युधिष्ठिर महाराज को भी डर लगता है क्योंकि उनको भी अपने गुरु का वध करने का उद्देश्य नहीं होता है उसको युद्ध से रोकना था और फिर तभी युधिष्ठिर महाराज भी डर जाते हैं।
तो भीम कहते हैं कि ये कैसे ब्राह्मण थे ब्राह्मण को युद्ध नहीं करना होता है। ब्राह्मण युद्ध कर लेने से वास्तव में ये ब्राह्मण हैं ही नहीं। तो जो धृष्टद्युम्न ने किया है वो अच्छी बात है और फिर तभी धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्य को बुरा भला कहने लगता है। और तभी अर्जुन तो शांत रहता है क्योंकि कृष्ण कुछ बोल नहीं रहे होते हैं तो अर्जुन का मित्र होता है और उसका एक शिष्य के समान होता है सात्यकि नाम का वो क्रुद्ध हो जाता है। और कहता है ये कितना बेरहम है धृष्टद्युम्न और एक तो अपने ही गुरु का वध कर रहा है और फिर दूसरों को कोस रहा है मैं आज उसको जीवित नहीं छोड़ूंगा। और सात्यकि अपनी गदा उठा लेते हैं और सात्यकि भी यादव योद्धा होता है शक्तिशाली योद्धा होता है और सात्यकि ने अपने चौदहवें दिन में बड़ा पराक्रम दिखाया होता है जब अर्जुन को जयद्रथ के लिए पहुँचना होता है।
तो सात्यकि धृष्टद्युम्न पर आक्रमण करने आ जाते हैं धृष्टद्युम्न भी तैयार हो जाते हैं युद्ध करने के लिए। और अभी पांडवों-पांडवों में युद्ध होने लग जाता है पांडवों की सेना में। तभी भगवान कृष्ण कहते हैं भीम सात्यकि को रोको, भीम जाके धृष्टद्युम्न को पकड़ लेते हैं सहदेव सात्यकि को पकड़ लेते हैं उनको लोग रोक लेते हैं। यहाँ पे कहने का मतलब यह है कि जो द्रोणाचार्य का वध हुआ था वह जैसे अभिमन्यु का वध हुआ था वह सब कौरवों ने योजना बना के पूरा षड्यंत्र करके किया था कि सबने देखा था। तभी कर्ण आते हैं उस दिन तो तेरहवें दिन जो होता है अभिमन्यु पहले जो लक्ष्मण होता है दुर्योधन का पुत्र उसका वध कर देता है और कोई भी उसका सामना नहीं कर पाता है तब छह योद्धा साथ में आके षड्यंत्र बना के उसको मारते हैं।
तो जो द्रोणाचार्य का वध उस तरह से नहीं था उसमें कोई षड्यंत्र नहीं था। आप कह सकते हैं कि थोड़ी सी बेईमानी थी तो वास्तव में वो बेईमानी इसलिए थी कि उसको युद्ध रोकने के लिए और उनका जो वध था वो धृष्टद्युम्न की क्रूरता के कारण उसने एक पल में कर दिया था। और पांडवों ने भी उसका विरोध किया तभी तो इसलिए यह जो है जैसे जो नैतिकता होती है जैसे पांडवों ने पहले हम देखते हैं कि कौरवों के युद्ध में क्या हुआ इस युद्ध में जो अभिमन्यु का वध था वो बड़े ही अनैतिकता से हुआ था। और उसके प्रतिकार में पांडवों की ज़िम्मेदारी नहीं थी कि वो ही योजना थी कि अगर आप नियम तोड़ेंगे तो हम भी ज़िम्मेदार नहीं हैं।
फिर भी अगर हम दोनों की तुलना करते हैं तो दोनों की तुलना में अभिमन्यु का जो वध था वो बड़ा घृणास्पद था। और हम द्रोणाचार्य के प्रसंग में ये भी देखते हैं कि कई दैवी लक्षण भी थे। ऋषियों ने उनसे कहा था कि तुम्हारा समय आ गया तुम युद्ध रोक दो। उनके जो तीर हैं वो खतम हो रहे थे और यहाँ तक कि उन्होंने प्राण शरीर भी त्याग दिया था पहले ही। तो उसके बाद में उनका सिर काटा गया तो इसलिए उसमें जो है ये भगवान की इच्छा के अनुसार हुआ था। तो साधारणतया झूठ बोलना ये अनुचित है पर जो truth and falsehood are never categorical they are always contextual कि सत्य और असत्य क्या है हम हर परिस्थिति में ये ऐसा ही सत्य है और ऐसा ही गलत है ये बोल नहीं सकते हैं। वो हमेशा परिस्थिति पर निर्भर है।
संदर्भ के अनुसार सत्य और असत्य (Contextual Truth)
अगर कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का वध करता है तो फिर वो बुरा है। पर मान लीजिए कोई व्यक्ति चोर है और किसी के घर में आया चोरी करने के लिए और उस समय जो घर का मालिक है वो अपने परिवार वालों को बचाने के लिए आक्रमण करता है। तो इन परिस्थितियों में पूर्ण अलग-अलग प्रभाव है। एक है कोई गुस्से में आकर किसी को मार डालता है या नफरत से मार डालता है। दूसरा है कोई संरक्षण के लिए मारता है और तीसरा है कोई युद्ध में मारता है। तो क्या सही है क्या गलत है वह जो बोलना है वह देश-काल-पात्र पे निर्भर है। अगर कोई सत्य और झूठ भी है वह भी उसी तरह से है।
पुराणों में कहानी आती है कि किसी तरह से वह लंबी कहानी है मैं इसमें नहीं जाऊंगा पर कैसे है कि सत्य और झूठ जो है वह… अगर मान लीजिए कोई चोर, कोई गुंडे किसी को मारने को आने वाले हैं और वह किसी के घर में आके छिप जाता है। आपके घर में आता है मुझे छिपने को बोलता है वह छिप जाता है। अगर वह गुंडे उसको पकड़ लेंगे तो उसको मार डालेंगे। तो अगर वह गुंडे आपके घर में आते हैं और आपको पूछते हैं क्या यह व्यक्ति को आपने देखा है? ‘हाँ हाँ यहीं पे आओ देखो उसको’ क्या हम कहेंगे ऐसे? बोलें कि मैं सत्य बोल रहा हूँ। पर सत्य से क्या होगा? बड़ा अत्याचार हो जाएगा। तो इसलिए सत्य और असत्य जो है वह हमेशा देश-काल-पात्र के अनुसार होता है।
तो अभी युधिष्ठिर महाराज ने जो कहा है कि झूठ बोला वो पर फिर भी जो झूठ था वह परम सत्य के अनुसार था। और उन्होंने पूर्णतया झूठ भी नहीं बोला। और भगवान जब कुछ करते हैं भगवान सबके ही शुभचिंतक होते हैं। तो इसलिए जो सत्य और असत्य है वह हमारे कल्याण के लिए बताया गया है। रास्ते में अन्धकार है पूरा तो फिर कोई टॉर्च होगा तो उससे हमें दिखता है रास्ता। पर अगर आसमान में सूरज है तो टॉर्च की ज़रूरत नहीं है। ठीक उसी तरह से हमारे नीति के नियम क्या हैं वह एक टॉर्च के समान हैं पर भगवान का जो आदेश है वह एक सूरज के समान है। तो भगवान का जो आदेश होगा तो हमारे नीति के नियमों को हमें बाजू में रखना चाहिए और भगवान की इच्छा को पूरा करना चाहिए।
पर भले ही कोई व्यक्ति सोचता है कि भगवान की इच्छा को पूरा करना महत्वपूर्ण नहीं है फिर भी नैतिक दृष्टि से देखा जाए तो भी हर समय झूठ बोलना गलत नहीं है।
अश्वत्थामा का क्रोध और नारायण अस्त्र
तो इसके बाद में अश्वत्थामा बड़ा क्रुद्ध हो जाता है और फिर वास्तव में जब दुर्योधन, कर्ण, कृपा सब दौड़ रहे होते हैं। तो जो कौरवों की सेना हो जाती है वो पूरी विचलित हो जाती है और वो दौड़ने लगती है। और दुर्योधन, कर्ण, कृपा सब दौड़ रहे होते हैं। अश्वत्थामा अपने घावों से ठीक होकर लौट के आ रहा होता है तो वो देखता है कि सब दौड़ते हुए भाग रहे हैं और वो पूछता है क्या हुआ? तो दुर्योधन बोल नहीं पाता है। कर्ण भी कुछ बोल नहीं पाता है। तभी कृपाचार्य वहां पे आते हैं दुर्योधन कहते हैं कि कृपा बताओ क्या हुआ है।
तो कृपाचार्य बताते हैं पूरा। तो फिर यह सुनके अश्वत्थामा बड़ा ही क्रोधित हो जाता है। अश्वत्थामा का क्रोध होता है लगता है कि उसके शरीर से अग्नि निकल रही है। कहता है पाण्डव तो बड़े खुद को नैतिक मानते थे ऐसा अनैतिक कार्य उन्होंने कैसे कर दिया? मेरे पास ऐसे दिव्य अस्त्र हैं कि इससे आज मैं उनका पूरा विनाश कर दूँगा। और आओ मेरे साथ तुम्हें दौड़ने की ज़रूरत नहीं है मैं ले जाऊंगा। और फिर तभी जाता है। जैसे यह इधर इस पक्ष में धृष्टद्युम्न सात्यकि झगड़ा कर रहे हैं और तभी कौरवों के विजय घोष के शंख बजने लगते हैं। और जो पाण्डव एक दूसरे को देखते समझ जाते हैं युधिष्ठिर महाराज कहते हैं कि अश्वत्थामा आ रहा होगा।
तो इसलिए अभी वो तैयार हो जाते हैं युद्ध करने के लिए। जब युद्ध चालू हो जाता है तो अश्वत्थामा एक बड़ा ही शक्तिशाली अस्त्र इस्तेमाल करता है उसका नारायण अस्त्र। नारायण अस्त्र ऐसा अस्त्र होता है कि उसका कोई विरोध करेगा तो उसकी शक्ति और बढ़ जाएगी। उस शक्ति और बढ़ जाएगी जितना विरोध करेगा उसकी शक्ति और बढ़ जाएगी। तो विरोध कर ही नहीं सकता है कोई। तो फिर क्या होता है सारे पांडव जो होते हैं एक तीर निकलता है उससे हज़ारों तीर बनते हैं और चारों ओर जो होते हैं सैनिक घायल होने लगते हैं और कोई प्रतिकार नहीं कर पाता है। और अर्जुन भी अपनी शक्ति से इस्तेमाल कर रहे हैं और ‘मैं वनवास में चला जाऊंगा’ युधिष्ठिर कहते हैं। कृष्ण कहते हैं हे राजा आपको डरने की ज़रूरत नहीं है।
और फिर वो कहते हैं कि युद्ध ये जो शस्त्र है उसका कोई प्रतिकार नहीं कर सकता है पर फिर भी इससे बचने का एक मार्ग है। वह क्या है? वह बोलते हैं कि इसके सामने आप सब दंडवत कर दो। वह शस्त्र कोई प्रतिकार करने के लिए रह जाएगा तो शस्त्र अपने आप चला जाएगा। तो अगर आप उसको प्रणाम कर दोगे उसके सामने तो वह किसी का वध नहीं करेगा। तो कृष्ण अर्जुन को कहते हैं तो अर्जुन चिल्ला के सब सैनिकों को बोलते हैं और सब सैनिक सभी झुक जाते हैं।
तो भीम झुकने को तैयार नहीं होते हैं। “कायर हो क्या कर रहे हो तुम! तो तुम अगर रोक नहीं सकते हो तो मैं रोकूंगा।” अर्जुन नहीं करते हैं तो “गांडीव छोड़ते हैं अर्जुन तुम तो गांडीव कभी नहीं छोड़ते हो तो क्या हो गया?” अभी कोई भी प्रतिकार करने के लिए होता है सिर्फ भीम है तो क्या होता है सारी नारायण अस्त्र की शक्ति भीम पे लगने लगती है। और जब भीम पे लगने लगती है भीम का सारा मानों शरीर जल रहा होता है। तो भीम का भी एक क्षत्रिय का गर्व होता है और नहीं तो चीखता है नहीं चिल्लाता है फिर भी युद्ध करते रहता है। तो तभी कृष्ण कहते हैं अर्जुन से कि भीम का जो अहंकार है उसकी मृत्यु का कारण बन जाएगा उसको रोकना पड़ेगा हमें।
तो फिर क्या करते हैं तभी अर्जुन भीम के ऊपर वरुणास्त्र छोड़ते हैं सारी अग्नि बंद हो जाती है पर फिर भी नारायण अस्त्र तो लग रहा है। तो फिर क्या होते हैं झुकते-झुकते ही कृष्ण और अर्जुन दौड़ते हुए जाते हैं और भीम का धनुष बाण उससे छीन लेते हैं और फिर कृष्ण उसको नीचे खींच लेते हैं। तो भीम अभी तो क्रोधित होता है तभी अर्जुन चिल्लाते हैं “ये जो अस्त्र है इसका कोई प्रतिकार नहीं कर सकता है ये हमारे आराध्य देव नारायण हैं उनका ही अस्त्र है। तो नारायण के सम्मान में प्रणाम करना उसमें कोई क्षत्रिय के गर्व के विरुद्ध नहीं है।” तो फिर तभी जाते हैं ये अस्त्र होता है उसका प्रभाव खतम हो जाता है और फिर पांडव उठ जाते हैं पुनः युद्ध करने लगते हैं।
अश्वत्थामा जब अस्त्र चला जाता है तब अश्वत्थामा बड़ा गर्व करने लगता है “देखो युद्ध आज ही खतम हो गया!” और फिर देखता है कि पांडव वैसे के वैसे खड़े हो गये। और जब अश्वत्थामा बड़ा गर्व करने लगता है दुर्योधन कहता है कि “ये अश्वत्थामा लगता है वो पांडव बच गए पुनः वो अस्त्र चलाओ।” तो अश्वत्थामा कहते हैं कि “ये अस्त्र ज़िन्दगी में एक ही बार चला सकता था मैं कई बार नहीं, वो दूसरा अस्त्र है देखते हैं।”
और फिर वो भार्गवास्त्र निकालता है। तो भार्गवास्त्र चलाता है तो अर्जुन जो होता है उसका प्रतिकार कर लेता है। और जब ये दो बहुत शक्तिशाली अस्त्र उसके पास थे, एक और अस्त्र होता है ब्रह्मास्त्र वो भी इस्तेमाल नहीं करता है और दोनों अस्त्रों का जो प्रतिकार हो जाता है तो अश्वत्थामा जो होता है वो अपने धनुष तीर को फेंक देता है और दौड़ते हुए चला जाता है। “सबकुछ मोह माया है क्या हो रहा है मुझे कुछ पता नहीं है।” और दौड़ते हुए चला जाता है।
अश्वत्थामा की हताशा और सौप्तिक पर्व का प्रारंभ
दौड़ते हुए चला जाता है तो वहाँ पर उसको व्यास देव दिखते हैं। व्यास देव को प्रणाम करता है। तो व्यास देव उसको बताते हैं कि नारायण अस्त्र प्रभाव नहीं करेगा क्योंकि कृष्ण ही नारायण हैं और अर्जुन जो हैं नर-नारायण ऋषि जो हैं अर्जुन और कृष्ण के रूप में आये हुए हैं और ये ऐसे योद्धा हैं कि उनके विरुद्ध में कोई जीत नहीं सकता है। कि बहुत हो गया अभी तुम संधि कर लो संधि नहीं कर लोगे तो फिर सबका विनाश हो जायेगा।
बताते हैं दुर्योधन कहता है कि “अभी तो बहुत समय हो गया अभी कुछ संधि करने में मतलब ही नहीं है पांडव मेरी बात भी मानेंगे नहीं। और जो सारे क्षत्रियों ने मेरे लिए प्राण त्याग दिया है उनके लिए अगर मैं कुछ कर सकता हूँ तो सिर्फ इतना कर सकता हूँ कि अपना भी प्राण त्याग दूँ तो अंत तक युद्ध होगा।” और फिर उसके बाद में शल्य का वध होता है और फिर भीम और दुर्योधन का युद्ध होता है। फिर इसमें भीम दुर्योधन को हरा देते हैं।
और फिर उसके बाद में अश्वत्थामा वहीं पे आता है और उसको पता चलता है कि किस तरह से भीम ने जो कमर के नीचे प्रहार किया होता है। वह सुनते हैं उसके बारे में हम चर्चा जब भीम के बारे में चर्चा करेंगे तभी हम देखेंगे उसकी नैतिकता अनैतिकता के बारे में। पर उससे अश्वत्थामा और क्रोधित हो जाता है और वह तभी क्या है अश्वत्थामा को अपने सेना का सेनापति बना देता है। और फिर यह उस समय तीन ही कौरवों के पक्ष से सैनिक बचे होते हैं सेनापति बचे होते हैं कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा। और फिर यह अठारहवें दिन की शाम तक हो गई होती है।
तो तभी वह वहाँ से दूर चले जाते हैं और वहाँ पे एक पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे होते हैं। तो थक गए होते हैं विश्राम करेंगे फिर अगले दिन हम देखेंगे क्या करेंगे। कृपाचार्य और कृतवर्मा को उठा लेता है और वह बताता है अभी सोये होते हैं उठ जाते हैं थके होते हैं “क्या हुआ बोलो।” वह अपनी योजना बताता है दोनों कृपाचार्य और कृतवर्मा को, “अश्वत्थामा मुझे मारना है तो शस्त्र से तुरंत मुझे मार डालो।”
तो कुछ ही समय में जो कौरवों और पांडवों की सेना होती है वहाँ एक लाशों का ढेर बन जाती है। तो उस समय जो युद्ध का रीतिरिवाज़ होता है उसमें अगर दो सेना का युद्ध हो रहा है तो अगर एक सेना जीत जाती है तो वह जीत का उत्सव मनाने के लिए जीत का प्रतीकात्मक रूप से दिखाने के लिए जो जीता हुआ पक्ष होता है उसके सेनापति जो होते हैं रणभूमि पे ही सोते हैं एक रात को। कृष्ण, पांच पांडव, सात्यकि ये सब पांडवों के तंबू में नहीं होते हैं। वे सब रणभूमि पे उस रात को सोये होते हैं। तो इसलिए वो उनका वध नहीं होता है।
और फिर यहाँ पे अश्वत्थामा सबका वध कर देता है और फिर वह आ जाता है वहाँ से। तो फिर वो ये पांच सिर लेता है और फिर दुर्योधन के पास आता है “मैंने पांचों पांडवों का वध कर दिया।” कहता है दुर्योधन अभी अपनी आख़िरी साँस ले रहा है बड़ा प्रसन्न हो जाता है वो। पांडवों के वध से आह्लादित है उसको विश्वास नहीं होता कि पांडवों का वध हो सकता है।
तो फिर क्या होता है वो पांच सिर लेता है तो क्या करता है अपने शरीर की बाकी शक्ति होती है उससे सिर दबाने का प्रयास करता है और सब सिर जो टूट जाते हैं। कहते हैं कि “हाय हाय यह पांडवों के सिर नहीं हैं!” और अर्जुन का पुत्र होता है श्रुतकर्मा उसकी मृत्यु हो गयी होती है, अभिमन्यु की मृत्यु हो गयी होती है, भीम का पुत्र घटोत्कच उसकी मृत्यु हो गयी होती है यह आखरी हमारे कुल के जीवित लोग थे तुमने उनका वध कर दिया है कितना घृणास्पद कार्य किया है!
तो वहाँ चली गयी है और इधर जो होता है पांडव जो होते हैं तो वहाँ से धृष्टद्युम्न का एक सारथी होता है वह बच जाता है और दौड़ते हुए आता है इधर संदेश देता है। और इधर जो संदेश मिलता है तो सारे पांडव जो क्रुद्ध हो जाते हैं दुखी हो जाते हैं पीड़ित हो जाते हैं। और फिर सहदेव से कहते हैं युधिष्ठिर महाराज कि “आप द्रौपदी को उस तंबू में लेकर आ जाओ और उनको कुछ बताओ मत। उनको बोलो कि इस विक्ट्री में बहुत करना है जाना है।” तो इस समय तभी प्रसंग मैं नहीं जाऊंगा कैसे ब्रह्मास्त्र का आक्रमण हुआ था वगेरा तो पर उस समय फिर भीम, अर्जुन, कृष्ण सब जाके अश्वत्थामा को पकड़ लेते हैं। और जब पकड़ के लेके आते हैं, उसके साथ क्या करना है, वो सवाल होता है।
अश्वत्थामा का कृत्य और धर्म-अधर्म का विवेक
तो अभी इस प्रसंग में क्या हुआ उसके लिए बोलता हूँ। अंत में पर जो अश्वत्थामा अभी वो सोचता है कि ये नियति ने मुझे बताया है कि इस तरह से वध करना चाहिए। तो वास्तव में, नियति जो होती है, वो कभी हमें सन्मार्ग के बारे में बताती है और कभी-कभी प्रलोभन भी देती है। तो हमें हमारी बुद्धि से विचार करना है, क्या सही है, क्या गलत है। तो यहाँ जो है, सारे हज़ारों हज़ारों सैनिकों का, जब वो सो रहे हैं, उनको मार डालना यहाँ बहुत ही घृणास्पद कार्य है।
जैसे मैं शुरुआत में बता रहा था, कि दूसरों को सज़ा देना अगर अश्वत्थामा का जो क्रोध था, वो सत्य था, वो उचित क्रोध था, कि उसके पिताजी की मृत्यु हो गई थी, उनको मार डाला गया था बहुत ही बेरहमी से। तो जिसने उसको मार डाला है, उसको मारो, पर उसके साथ-साथ हज़ारों लोगों को मार डाला है, वो भी जब वो सो रहे हैं, यहाँ क्या है, यहाँ उसका बड़ा ही घृणास्पद कार्य था।
और कैसे होता है, कि प्रकृति जो होती है, जो हम करना चाहते हैं, उसके लिए हमें सुविधा देती है। अगर कोई व्यक्ति पाप करना चाहता है, तो प्रकृति उसको पाप करने के लिए सुविधा देगी। कोई पुण्य करना चाहता है, उसको पुण्य करने के लिए सुविधा देगी।
किसी व्यक्ति ने सवाल पूछा, कि अगर किसी व्यक्ति के प्रति गुनाह होता है, तो क्या वह व्यक्ति के कर्म का फल है वो? तो मैंने जवाब दिया, कि हमें, अगर किसी के प्रति कुछ होता है, तो वह उसके कर्म का फल है या नहीं? यह देखना हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है। ऐसे, अगर सीता का अपहरण होता है, तो रामचंद्र यह नहीं कहते हैं कि उसके कर्म का फल उसको मिल रहा है। नहीं।
किसी के कर्म का क्या फल है, वहां मुझे लेना-देना नहीं है। मुझे क्या देखना है, मेरी ज़िम्मेदारी क्या है? तो, वहां उनकी पत्नी है, पत्नी का संरक्षण करना उनका कर्तव्य है। वहां राजा हैं, राज्य में कोई गैरकानूनी कार्य नहीं होना चाहिए। वहां किसी के जीवन में कोई अत्याचार होता है, तो वह व्यक्ति अपने मन में सोच सकता है कि, ‘अगर मुझे कुछ हो गया है, तो मैं सोचूंगा कि ये मेरे कर्म का फल मुझे मिल रहा है।’ वह एक तरह से ठीक है, पर अगर कोई सरकार की दृष्टि से देखा जा रहा है, तो पूर्व जन्म के आधार पर हमें किसी का देखना नहीं चाहिए।
इस जन्म के आधार पर अगर कोई अन्याय हो रहा है, तो अन्याय का फल देना चाहिए।
सोते हुए योद्धाओं को मारना तो इसलिए जो महाभारत के अलग-अलग चरित्र हैं, पात्र हैं उनसे हम देखते हैं कि वास्तव में कि जो उसकी परिस्थितियां आती हैं व्यक्ति के जीवन में वैसी परिस्थितियां बिल्कुल वैसी नहीं हैं पर उस प्रकार की हैं। और हम महाभारत से देख सकते हैं कि व्यक्ति किस तरह से कार्य किया और उससे हम समझ सकते हैं कि मुझे ऐसा कार्य करना चाहिए ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए।
प्रभुपाद जी बताते थे कि जो शास्त्र हैं वो जो हम पढ़ते हैं वो केवल मनोरंजन के लिए पढ़ना नहीं है हमें, उसको मनोरंजन के लिए नहीं परिवर्तन के लिए पढ़ना है। कि हम उसको समझते हैं कैसे मेरा जीवन जीना है। और ऐसे ही हम अगले प्रवचन में हम कर्ण के बारे में चीज़ें चर्चा करेंगे। तो बहुत-बहुत धन्यवाद।
प्रश्नोत्तर: दया और न्याय का संतुलन
किसी का कोई सवाल है?
(प्रश्न): “जैसे पढ़ने के बाद थोड़ा कंफ्यूज़िंग होता है द्रौपदी है न जब ही अश्वत्थामा को लाते हैं तो मारने के लिए तैयार होके तो द्रौपदी उनको बोलती है उसको मत मारो क्योंकि इसकी माँ को इतना दुख होगा कि मैं सहन कर सकती हूँ तो ऐसा उसको मारो मत क्योंकि इसकी माँ को दुख होगा। तो यही द्रौपदी अपना वस्त्रहरण होने के बाद द्रौपदी अश्वत्थामा पर दया करती है उसको वध नहीं करना चाहिए कृपी को बड़ा दुख होगा। जब उसका वस्त्रहरण हो जाता है तभी वो कृपा करते तो कोई युद्ध ही नहीं होता था?”
यहाँ पर मुझे समझाना चाहिए कि दो तत्त्व हैं एक है दया और दूसरा है न्याय। तो यह दोनों का हमेशा समतोल होना चाहिए। तो ऐसे जब यह राम जन्मभूमि का प्रसंग चल रहा था तो तभी जब कोर्ट में डिसीजन दिया गया कि वहाँ पहले राम का मंदिर था तो जो तीन जजों ने फैसला किया तो वहाँ पे उनमें से एक जज मुसलमान था। क्योंकि वह सबूत है इतना स्पष्ट है कि वहाँ पर राम मंदिर था तो उसको भी मानना पड़ा कि यहाँ पर राम मंदिर था तो उसने भी सहमति दी कि यहाँ पर राम मंदिर था।
पर उसने क्या किया तभी बोला कि आप राम राम इतना नाम ले रहे हो राम का पर राम के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश क्या है? त्याग! राम ने जब राज्य का त्याग करने को तैयार हो गए वो कि सारे राज्य का त्याग कर दें अपने पिता का आदेश पालन करने के लिए तो तुम राम का नाम ले रहे हो पर राम के जीवन का सबसे प्रधान सीख है वो तुम सीख लोगे तुम ये मंदिर को त्याग दोगे तो इतना सारा संघर्ष टल जाएगा।
मेरे वेबसाइट पर सवाल पूछा किसी ने तो कहते हैं कि जो त्याग है जब उनके पिता ने उनको आदेश दिया तो उन्होंने अपने पिता के आदेश का पालन किया तो वहां पर उसको त्याग कर सकते हैं पर अगर सिर्फ त्याग ही ये अकेला ही रामायण का सीख होता तो फिर जब रावण ने सीता का अपहरण कर लिया है कि त्याग ये एक सद्गुण है। वैसे दया करना, किसी को माफ कर देना ये सद्गुण है पर सबसे महत्वपूर्ण क्या है कि कर्तव्य क्या है, धर्म क्या है वह महत्वपूर्ण है। तो धर्म के अनुसार कभी त्याग करना उचित है और कभी अपना अधिकार जो है उसके लिए आगे बढ़ना उचित है। कभी माफी करना उचित है कभी सज़ा देना उचित है। तो धर्म क्या है वह अलग-अलग परिस्थिति में समझना अलग-अलग है।
तो अभी ये दोनों परिस्थितियां अलग क्यों हैं क्योंकि अश्वत्थामा कोई राजा नहीं था। अश्वत्थामा के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं थी अभी क्योंकि उसकी मणि निकाल ली गई थी कि वहाँ किसी का कोई नुकसान नहीं कर सकता था। तो इसलिए अश्वत्थामा को माफ करने से मतलब उसको माफ नहीं किया कि उसकी मणि छीन ली गई पर उसका जीवन नहीं लिया गया। तो उससे समाज में कोई उपद्रव नहीं होने वाला था। पर जो कौरव थे उन्होंने राज्य छीन लिया था। अगर कोई राजा इतना बेरहम हो सकता है इतना बेशरम हो सकता है किसी स्त्री को अपनी सभा में अपने वरिष्ठों के सामने निर्वस्त्र करे तो वैसा राजा अपनी सारी प्रजा के साथ क्या कर सकता है?
तो ऐसे व्यक्ति को राजा बनाये रखना यह धर्म के प्रति बड़ा अत्याचार हो जाता था समाज के प्रति अत्याचार हो जाता था। और इसलिए ऐसे राजा को निकालना यह एक क्षत्रिय की ज़िम्मेदारी है। वहां पे दया दिखाना यह वास्तव में कोई उच्च कार्य नहीं है वह वास्तव में अनुचित कार्य है वहां पे मूर्खता हो जाएगी। वास्तव में अगर दया दिखाना है अगर दया दिखाने की बात देखते हैं तो हम कहते हैं अर्जुन सोच रहा था युद्ध नहीं करना है भगवान कृष्ण भगवद्गीता बोलते ही नहीं थे युद्ध नहीं होता था भगवान ने युद्ध करवाया क्यों? युद्ध करवाया क्योंकि उस समय वह आवश्यक था। और पांडव हैं हम देखते हैं कितने प्रयास किए पांडवों ने और युधिष्ठिर महाराज ने कहा कि मैं सब पांच गांवों से संतुष्ट हो जाऊँगा भगवान कृष्ण स्वयं गए शांतिदूत के रूप में। तो उन्होंने पूरा प्रयास किया पर फिर भी जब वह तैयार नहीं थे तभी युद्ध अनिवार्य था।
तो जो माफ़ी है, दया करना या माफ़ी करना किसी को वह उचित है, वह अच्छा गुण है पर सद्गुण जो भी है वह भी एक उसका भी एक देश-काल-पात्र है क्योंकि दया यह एक ही सद्गुण नहीं है जो न्याय है, वह भी एक सद्गुण है। Non-violence at the cost of violence can be the greatest violence. अगर हम अहिंसा चाहते हैं अहिंसा के लिए हम न्याय को त्याग देते हैं तो वह बहुत बड़ी हिंसा हो सकती है। अगर कोई आतंकवादी है वो सैंकड़ों लोगों को मार रहा है और उसको माफ कर दिया जाए और वो बाहर आकर सैंकड़ों लोगों को मार डालता है तो हमने अहिंसा दिखाई उसके प्रति पर न्याय को त्याग दिया उसको सज़ा नहीं दी पर क्या होगा? जो अहिंसा हम करते हैं जो न्याय को त्याग के वह बहुत बड़ी हिंसा हो सकती है। समझ गए?
कोई और सवाल है किसी का? बहुत-बहुत धन्यवाद। श्रील प्रभुपाद की जय! गौर भक्त वृन्द की जय! निताई गौर प्रेमानंदे!