Gita 18.13-18.28 – The five factors and the three components of action (Hindi)
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Lecture Summary
यह प्रवचन श्रीमद्भगवद्गीता के 18वें अध्याय के दूसरे भाग पर आधारित है, जिसमें भगवान यह समझाते हैं कि निष्काम भाव से कर्म करने पर व्यक्ति कर्मों के बंधन में क्यों नहीं फँसता।
- कर्म के पाँच कारण: भगवान बताते हैं कि प्रत्येक कर्म की सिद्धि के लिए पाँच कारक होते हैं—अधिष्ठान (परिस्थिति या शरीर), कर्ता, करण (इंद्रियाँ), विविध चेष्टाएँ (प्रयास), और दैवात् (दैवीय संस्थिति या भाग्य)। जो व्यक्ति यह अहंकार कर बैठता है कि “सब कुछ मैं ही अकेला करने वाला हूँ,” वह मोह और अज्ञान में रहता है।
- सांख्य दर्शन और विश्लेषण: सांख्य दर्शन के आधार पर कर्म, ज्ञान और कर्ता का तीन गुणों (सत्व, रज, तम) के अंतर्गत वर्गीकरण किया गया है।
- ज्ञान, कर्म और कर्ता के तीन प्रकार:
- सात्विक ज्ञान और कर्ता: जो सभी भूतों में एक ही आध्यात्मिक भाव देखता है, तथा जो कर्ता आसक्ति से मुक्त, अहंकारहीन, धैर्य और उत्साह से युक्त होता है, वह सात्विक कहलाता है।
- राजसिक और तामसिक प्रकृति: इसके विपरीत, जो ज्ञान विभिन्न वस्तुओं में भेद करता है और जो कर्ता लोभी, हिंसात्मक तथा फल की प्राप्ति पर अत्यधिक हर्ष-शोक करने वाला होता है, वह राजसिक और तामसिक श्रेणियों में आते हैं।
Full Transcription
अठ्रवे अध्याय का दूसरा विभाग शुरू कर रहे हैं। जो पहला विभाग था, पहले श्लोक से बारहवें श्लोक तक, उसमें चर्चा की कैसे कि कर्म के त्याग से बेहतर ही है कि कर्म के फल का त्याग करें और कर्म को कर्तव्य के रूप में करें। तो अभी सवाल आता है कि कर्मा अगर कोई करने वाला है, तो क्या वह व्यक्ति बंधन में नहीं फँसेगा? कर्मा करेगा तो बंधन में फँसेगा? तो कर्मा करते हुए बंधन में क्यों नहीं फँसता है व्यक्ति, अगर वह निष्काम होता है? तो उसका थोड़ा विश्लेषण भगवान अभी अगले श्लोक में करते हैं। तो इसके लिए सांख्य भगवान उपयोग करते हैं समझाने के लिए। सांख्य के आधार पर वह समझाते हैं किस तरह से हम बद्ध नहीं होते हैं। हम चर्चा करते हैं तेरहवें श्लोक से:
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
सांख्यकृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥
तो पञ्चैतानि महाबाहो—हे महाबाहो! पञ्चैतानि, पाँच विभाग हैं या पाँच factors/causes कारण होते हैं। पाँच विभाग बोल सकते हैं, जवाब भी सही नहीं आता है, पाँच होता है जवाब पर factors, तो उसके पाँच अंश हैं बोल सकते हैं—पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे। सांख्यकृतान्ते प्रोक्तानि—सांख्य में इसका विश्लेषण होता है। कृतान्ते, प्रोक्त—अंते, कृति को हम करते हैं, तो उसका अंत मतलब उसको समझने के लिए, उस यश तक पहुँचने के लिए प्रोक्तानि, ऐसे लोग कहते हैं सिद्धये सर्वकर्मणाम्, और ये पाँच हैं, सर्वकर्मन् में रहते हैं।
तो अभी सांख्य क्या है? सांख्य ये—यह षड्दर्शन होने से एक दर्शन है और इस दर्शन में अधिकांश लोगों से इस भौतिक जगत का विश्लेषण होता है। तो इस सांख्य का उल्लेख कई बार आया है भगवद्गीता में। सबसे पहले आता है दूसरे अध्याय के उनतालीसवें श्लोक में—एषा तेऽभिहिता सांख्य बुद्धियोगे त्विमां शृणु।
सांख्य का विश्लेषण क्या होता है? कि अलग-अलग विभागों में विश्लेषण हो रहा है, विभाजन हो रहा है। तो इस तरह से जो विश्लेषण, विभाजन हो रहा है, उसका अर्थ क्या होता है? कि जहाँ हम विश्लेषण करके ठीक हो और समझ सकते हैं। तो अभी एक तो है भौतिक अस्तित्व का हम विश्लेषण कर सकते हैं, विभाजन कर सकते हैं, उस तरह से हम भौतिक जो तत्व हैं और भौतिक कर्म कर रहे हैं कोई भी, उसका भी विश्लेषण कर सकते हैं। तो उसका विश्लेषण अगले श्लोक में करते हैं भगवान:
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक् चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥
अधिष्ठानं—अधिष्ठानं मतलब जो परिस्थिति है। प्रभुपाद इसको बताते हैं कि शरीर पर क्या है, आत्मा जिस भौतिक परिस्थिति में है, उस पर वह निर्भर होता है। यश कैसे आएगा? कर्ता—व्यक्ति जो कार्य कर रहा है। फिर इसके बाद में करणं—करणं मतलब उसके बाद जो अभी करण है, हमारे जो इंद्रियाँ हैं या जो सुविधा है कार्य करने के लिए। तार पृथग्विधम्—तो अलग-अलग प्रकार के करणं होते हैं।
फिर क्या होता है? जिस जगह पर वह खेलने वाले हैं मैच, वह बहुत महत्वपूर्ण होता है। अगर भारत का ऐसा है कि भारत इंडिया में शेर होता है, बाहर जाता है तो चूहा बन जाता है, तो सबसे हार जाता है भारत। तो क्या है? वह अधिष्ठानं, जिस जगह पर कार्य हो रहा है, वह बहुत महत्वपूर्ण है। तो जो आत्मा है, वो शुद्ध है, भगवान का अंश है। आत्मा भी भगवान का अंश है, नहीं उसमें, पर आत्मा भी शक्ति है, पर वही आत्मा जो आसमान में पक्षी के स्वरूप में होता है, तो उड़ता है। अगर वो गरुड़ जैसे कोई ईगल है, गिद्ध है—गिद्ध नहीं, गिद्ध नहीं, बाज है, घार है—तो फिर क्या है? वो ऊँचा इधर जा सकता है, दूर तक देख सकता है, चील—चील और बहुत तेज़ी से उड़ सकता है।
पर वही आत्मा अगर एक चींटी के स्वरूप में आता है, तो धीरे-धीरे चलना पड़ता है कि कोई पैर देखता है, तो मृत्यु हो जाएगी। तो अधिष्ठानं तो क्या कर पाएगा कोई कि वो अधिष्ठानं शरीर पर निर्भर है? तो अगर कोई बहुत पहलवान व्यक्ति है, तो बड़ा वजन उठा सकता है, पर कोई अगर कमज़ोर है, वजन उठा नहीं सकता है। तो आत्मा एक जैसा है, तो वजन पर अधिष्ठानं और उसके बाद में कर्ता है।
तो क्या है कि भले ही क्रिकेट मैच चल रहा है, उसका बहुत अच्छा पिच भी है, पर अगर वो बैट्समैन है, वो कैसे है, बल्लेबाज है, उसमें निर्भर है। अगर वो बहुत अच्छा बल्लेबाज है, तो वो अच्छे से बैट मार सकता है, कि उसके सारे मार देगा। अगर वो ग्यारवें नंबर का बैट्समैन है, उसके सारे मार, बैट पकड़ के रखता है, तो वो क्या होता है? वो बैट के लिए कितना अच्छा पिच हो सकता है, तो क्लीन बोल्ड हो जाएँ।
तो क्या है, जो परिस्थिति है, उस पर निर्भर है, उसके साथ-साथ वो व्यक्ति है, उस पर भी निर्भर करता है। फिर उसके बाद में करणं—करणं मतलब क्या? इंद्रियाँ हैं और इंद्रियाँ के साथ-साथ उसका अर्थ है, यह भी जो कार्य करने के लिए सुविधा है। तो अभी कोई गायक पर क्रिकेट का धर्म लेते हैं, फिर और धर्म भी लुखाते हैं। क्रिकेट में क्या है? अगर कोई व्यक्ति बड़ा ही शरीर से पूरा तंदुरुस्त होगा, पर अगर वो बल्लेबाज है और उसके हाथ की छोटी सी उंगली फ्रैक्चर होगी, तो क्या है?
मतलब जो उस कार्य करने के लिए विशेष करना लगता है, वहाँ भी महत्व बोलना है। और कई बैट में होते हैं कि उनकी खुद की फेवरेट बैट होती है, कि वो बैट से अच्छा खेल सकते हैं, वो बैट, दूसरी कोई बैट होगी तो खेल नहीं पाते हैं। और कभी-कभी वो मैच के शुरुआत में एकदम हल्की बैट आते हैं, क्रिकेट के बैट नहीं, जो अंधेरे में देख सकता है, उसके आँख उल्टा टटके रहता है गुफा में होता है—चमगादड़!
चमगादड़ क्रिकेट के बैट नहीं देख सकता है, उसके आँख उल्टा टटके रहता है गुफा में होता है—उल्लू! जो अंधेरे में देख सकता है, हम साधारण अंधेरे में नहीं देख सकते हैं। चमगादड़, क्रिकेट के बैट नहीं, देख सकता है उसके आँख उल्टा टटके रहता है गुफा में होता है उल्लू, जो अंधेरे में देख सकता है, हम साधारण अंधेरे में नहीं देख सकते हैं। हमारे इंद्रियों पे कर्म-कर्म की क्षमता बड़ी निर्भर होती है।
फिर उसके बाद में तो इंद्रियाँ क्या है? इंद्रियं च पृथग्विधं, करणं च पृथग्विधं, क्योंकि अलग-अलग प्रकार के कर्म के लिए अलग-अलग प्रकार की इंद्रियाँ लगती हैं। तो अगर कोई गायक है, बड़े, उसका पैर सर्कुलर हो जाएगा, तो उससे गायक को कुछ फर्क नहीं पड़ने होगा, क्योंकि उसके लिए जो इंद्रियाँ लगती हैं, वहाँ पर्याप्त इंद्रियाँ वहाँ पर मौजूद हैं। और फिर उसके बाद में विविधाश्च पृथक् चेष्टा, और अलग-अलग प्रकार की चेष्टा करनी पड़ती है।
चेष्टा मतलब प्रयास, कैसे है कि किसी में क्षमता भी है, प्रतिभा भी है, टैलेंट है, पर उसके बाद में होने के बाद में उसको प्रैक्टिस करना होता है। कोई बहुत अच्छा गायक भी हो, फिर भी अगर उसको उत्कृष्ट गायक बनना है, तो उसको प्रैक्टिस करना होता है, तो वो चेष्टा है। चेष्टा नहीं करता है व्यक्ति, तो क्षमता होगी, तो भी वो फल में परिवर्तित नहीं होगा, परिवर्तित नहीं करता है, तो परिवर्तित नहीं करता है… चेष्टा नहीं होगी, तो फिर हम जो दक्ष नहीं बन सकते हैं, थोड़ा बहुत कार्य कर पाएँगे, पर दक्ष नहीं बन सकते हैं।
“न सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः” मैं पढ़ाई नहीं करूँगा और फिर बाद में मार्क्स नहीं मिलते हैं, तो वो किस्मत पे नहीं डाल सकता है। वो जो नियति है, वो उसके अंग भले निर्धारित करती है, पर उसका कितना पढ़ाई करना है, किस तरह से तैयारी करना है, वो निर्धारित करती है, वो उसके हाथ में। तो क्या है? दो प्रकार की विचारधारा है। एक है कर्मवाद और दूसरा है दैववाद।
कर्मवाद मतलब सब कुछ मेरे ही हाथों में है, मैं अगर मेहनत करूंगा, तो मैं दुनिया का अगला सबसे बड़ा करोड़पति बन जाऊँगा। और दैववाद मतलब क्या? मैंने किस्मत पर छोड़ दिया। तो कर्मवाद और दैववाद ये दोनों प्रकार की धारणाएं हैं। और वैदिक शास्त्र का क्या अर्थ है, क्या भाव है? कि कर्मवाद और दैववाद दोनों साथ में हैं, तभी फल की प्राप्ति होती है। क्या है कि इसके लिए उदाहरण क्या है? एक किसान का उदाहरण। किसान जो है, उसको अपनी खेती करना ये कर्म है, पर खेती करने के बाद बारिश उचित मात्रा में उचित समय में आना ये दैववाद है। तो कर्मा और दैववाद दोनों साथ में आते हैं, और उसके साथ-साथ एक वाद और आता है—कार। ये वायु पुराण में आता है। तीनों, विश्वास, कार, कर्म, दैववाद और कार जो तीनों आते हैं, प्राप्ति होती है, तभी फल आता है।
तो इस श्लोक में पहले चार जो हैं, वो सब कर्मों में आते हैं—अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्, विविधाश्च पृथक् चेष्टा—यह सब कर्म का विभाग हैं। और जो पाँचवाँ—दैवं चैवात्र पञ्चमम्। तो कर्मा और दैववाद दोनों साथ में, फिर फल आता है। तो भी भगवान बताएंगे, आगे इसका वर्णन करेंगे:
शरीरवाङ्मनोभिय्या कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥
शरीरवाङ्मनोभिर्वा—शरीर से, मन से, वाणी से अगर कोई कार्य करता है, तो कर्म प्रारभते नरः, प्रारंभ करता है करता है वो कार्य। तो अगर किस प्रकार का कार्य है—न्याय्यं वा विपरीतं वा—अच्छा हो या बुरा कार्य, सब कार्यों में यह पाँच चीज़ें होती हैं। अगर कोई चोरी करना चाहता है, तो उसके लिए भी सब महत्वपूर्ण है—परिस्थिति होनी चाहिए। अगर वो चोरी करना चाहता है, अगर वो ऐसे जगह पर जाएगा है, बहुत सिक्योरिटी है वहाँ पर, सारे अलार्म वहाँ बज रहे हैं, तो वहाँ पर करने करता है चोरी? तो अधिष्ठान था, कर्ता कोई चोर होगा, वो चोरी करने जाएगा, तो इतना आवाज़ कर देगा, तो पकड़ लेगा। तो उसकी कितनी दक्षता है, उसके लिए भी वो गलत कार्य है, पर उसके लिए भी क्या है? ये पाँच कार्य आते हैं।
कभी चोरी करने का प्रयास करता है, तो कोई आ जाता है वहाँ पर, तो भाग जाता है, भाग जाना पड़ता है उसके लिए, तो वहाँ पर दैव आता है। सक्सेस होता है, इस से नहीं होता है। तो न्याय्यं वा विपरीतं वा, इन सब में ये पाँच भाग आते ही हैं—पञ्चैते तस्य हेतवः।
और फिर इसके बाद में अब ये क्यों विश्लेषण कर रहे हैं भगवान? तो हम कर्म के बंधन में कब फँसते हैं, कब नहीं फँसते हैं, वह बता रहे हैं:
तत्रैवं सति कर्तारम् आत्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥
तत्रैवं सति—तो ऐसे कर्म होता है, कर्म करता है, आत्मानं केवलं तु यः—अगर सोचता है कि मैं ही करता हूँ, मैं ही करता हूँ, अगर सोचता है आत्मानं केवलं तु यः, मैंने किया इसलिए यहाँ फल मिल गया, तो फिर क्या है? वह—वह पश्यत्यकृतबुद्धित्वान, तो वह पश्यत्य, यह देख रहा है, वह अकृतबुद्धित्वान, उसकी जो बुद्धि है, वह विकसित नहीं है, उसे मैं देख नहीं पा रहा है, और न स पश्यति दुर्मतिः, वह जो देख रहा है, वह जो देख रहा है…
कई बार क्या होता है? कोई चैंपियन बैट्समैन भी होता है, वो आता है बैटिंग करने के लिए और वो क्लीन बोल्ड हो जाता है। वो कहते हैं कि यह तो चैंपियन बैट्समैन है, कोई आठ-आठ बॉलर से बोल्ड हो जाता है, कहते हैं कि यह लोग कहती है कि आज आउट-ऑफ-फॉर्म है। तो अभी कोई बैट्समैन चाहता था नहीं कि मैं आउट-ऑफ-फॉर्म हूँ, तो वो क्यों आउट-ऑफ-फॉर्म जाता है? क्या है वो उसके हाथ में नहीं है!
क्या है, खास करके ना यहाँ पे खेलों का उदाहरण क्यों दे रहा हूँ? कि उसमें हम साधारण जीवन में शायद देखते नहीं हैं। खेलों में क्या होता है? फल मिलने पे बहुत सुख होता है, फल ना मिलने पे बहुत दुख भी होता है, भावनात्मक रूप से वो बहुत… अगर टेनिस का मैच देख रहा है, तो मैच जीतता है, तो एक ऐसे बंदर के समान कूदता है और दूसरा जो है, वो एक अर्थों के समय चीखिर जाता है, वो क्या होता है?
तो क्या होता है? ये द्वंद्व हम बहुत देखते हैं, पर यह जो होता है, कोई भी खिलाड़ी है, अगर वो काफ़ी समय तक खेला है, तो सब खिलाड़ी जानते हैं कि वास्तव में खेल में हमारे कार्य के अलावा भी, हमारे खेल के अलावा भी और कुछ चीज़ें हैं जो फल निर्धारित करते हैं। और वास्तव में जो और कुछ फल निर्धारित करते हैं, तो उसको अनुकूल करने के लिए वो अपना-अपना कुछ कार्य करते हैं।
तो बहुत से स्पोर्ट स्टार्स होते हैं, खिलाड़ी होते हैं, क्रिकेटर होते हैं, खास होते हैं, उनके अपने-अपने कुछ अंधश्रद्धा होती है। अब एक खिलाड़ी था, वो बैट्समैन था, ऑस्ट्रेलिया का बैट्समैन था कि जब वो बैटिंग कर रहा था, तो बैटिंग करने के जाने के पहले वो चार बार जाके जो पवेलियन के बाजू में वाशरूम होते थे, वाशरूम का कमोड का जो ढक्कन है, पूरा बंद हो रहे, के देखता हूँ। अगर वो खुला रह जाएगा, तो मैं आउट हो जाएगा। या अगर वो जल्दी आउट हो जाएगा, तो आउट होने के बाद पवेलियन जाते थे, पहले कमोड का जगह था, खुला रहे, देखता हूँ। और खुला रहे, तो किसे खुला रहा था? वो उसके बाद मैं आउट हो गया।
अगर वो मैच का एंड आ रहा है, तो वो कहा था कि मैं यहाँ बैठा हूँ और वहाँ से उठना नहीं चाहिए। मैं अगर बैठा रहूँगा, तो वहाँ पर बैट्समैन अच्छे से बैटिंग करेगा, तो वहाँ से उठ गया, तो वह बैट्समैन आउट हो जाएगा। और वो कहा, एक समय कैप्टन बन गया था, तो पूरे टीम में से किसी को उठने को नहीं दिया था, तो दूसरे में वो पेशाब को लेया था, मत जाओ, भले।
अभी क्या है? वो अलग-अलग प्रकार से उनका भाव देता था। एक और ऑस्ट्रेलिया कैप्टन था, तो वो क्या था? उसका आइडिया था कि उसका एक लाल रुमाल था और वो रुमाल था वो बराबर एक तिहाई पॉकेट से बाहर रखता था और दो तिहाई अंदर और वो कहता था कि वो पॉकेट में वैसे रुमाल रखूँगा, तो फिर वो सारा मैच अच्छा चलेगा, मैं बैटिंग कर रहा हूँ, बॉलिंग कर रहा हूँ, सब कुछ होगा। अगर पहले कैच ड्रॉप हो गया था, पहले बॉल नहीं देखता था कि वो क्या था। एक बहुत फेमस टेनिस प्लेयर था, वो क्या करता था? एक कान में रिंग पहनता था, ये रिंग है, दो कान में पहनता था, तो एक कान में पहनता था, एक-एक कान में पहनता था, तो यह जो है, इससे मैं अच्छा खेल पाऊँगा।
तो क्या होता है? अभी हम यह सब लेंगे, तो यह सब हँसेंगे इसमें, पर इस सब से हम क्या समझ सकते हैं कि यह खिलाड़ी भी समझते हैं कुछ तरह से कि हमारी क्षमता के अलावा भी और कुछ शक्ति है जो फल निर्धारित करती है। तो भी उनको पता नहीं है वो शक्ति क्या है। तो वो शक्ति क्या है और कैसे कार्य करती है, वो उनको पता नहीं है, पर एक भाव क्या है? अगर व्यक्ति इस दुनिया में रहता है, कुछ समय तक भी, तो समझ जाते हैं कि जो फल है, वो सिर्फ मेरे हाथ में नहीं है।
तो आत्मानं केवलं तु यः—जो सोचता है कि मैं ही करता हूँ, वह माया में है, वास्तव में वह मूर्ख है। और जब हम कहते हैं जो तीसरे अध्याय के सत्ताइसवें श्लोक में कहते हैं—प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारमूढ़त्मा कर्ताहमिति मन्यते॥ कि कर्ता अहम्, देवी कर्ता हूँ, वह वह माया में है, वह मूढ़त्मा कर्ता है।
पर यद्यपि भगवान ने ऐसे कहा है कि जो खुद को करता समझता है वह माया में है, पर भगवद्गीता के अंत में भगवान क्या कहते हैं—अच्छा! भगवद्गीता के तेरहवें श्लोक में अभी इसे निश्चित करो, कुरु, अभी आपको इसे करना है, वैसे करो। उसका अर्थ क्या है? मतलब आप करता हो। और फिर उसके दस श्लोक बाद तेईसवें श्लोक में अर्जुन क्या कहते हैं—करिष्ये वचनं तव। अंततः मैं आपका वचन करूँगा।
मतलब क्या है? भगवान भी कह रहे हैं, अब तुम करता बनो, जैसे तुम करना चाहते हो, वैसे करो। अर्जुन कह रहे हैं कि मैं आपका वचन करूँगा। तो अगर भगवान कह रहे हैं कि जो सोचता है कि मैं करता हूँ वो मोह में है, तो भगवान अर्जुन कह रहे हैं कि आप करो, अर्जुन कह रहे हैं कि मैं करूँगा। तो वहाँ पर मोह क्या है? मोह यह नहीं कि मैं करता हूँ, हम करता है, पर मोह यह है कि मैं अकेला करता हूँ, वो मोह है।
क्योंकि हम तो एक भगवान को… मैं भगवद्गीता का प्रवचन दे रहा था, एक बार ऐसे भगवद्गीता पर कोच चल रहा था, तो मैं करता हूँ कि हम करता नहीं है। तो कई सवाल आते हैं मन में, तो क्या-क्या सवाल आते हैं? तो अलग भगवान बोल रहे थे कि एक भगवान बोला कि मैं करूँगा नहीं, तो फिर फल नहीं आता है, मैं करता हूँ, अलग भगवान बोल रहे थे। तो एक भगवान बोल रहे था, वो बहुत आलसी भगवान था, तो बोलने लगा—अगर मैं करता नहीं हूँ, तो कुछ करने की ज़रूरत क्या है, बोले?
पर क्या है? फिर जब प्रसाद का समय आता है, तो करने की इच्छा हो जाते हैं, तो सोने का समय आता है, तो करने की इच्छा हो जाते हैं। तो करता तो है हम वास्तव में, पर हम क्या है? हम हम अकेले करता नहीं है। अकेले करता ऐसा सोचना वो मोह है। तो अगर मैं करता हूँ, मैं समझता हूँ कि वास्तव में संपूर्ण ब्रह्मांड में भगवान के अधिष्ठाता में कार्य चल रहा है और भगवान के अधिष्ठाता में कार्य चल रहा है, तो फिर मुझे भगवान की इच्छा… तो भगवान की इच्छा में कार्य चल रहा है, यह अगर भगवान जो भक्तों के स्तर पे आए हैं, तो बता रहे हैं और यहाँ पर क्या बता रहे हैं?
अगर मैं करता हूँ कि समझता है व्यक्ति, तो वो मोह में नहीं है। शरीर जो है एक वाहन के समान है आत्मा के लिए। यह आत्मा सोचता है कि मैं ही शरीर हूँ, वो क्या है अहंकार—I am my car! तो मैं मेरा वाहन हूँ और ऐसा व्यक्ति हत्वापि स इमान लोकान्, वो भले ही किसी का वध भी करता है, तो न हन्ति, नहीं करते, वास्तव में वध नहीं कर रहा है और वो बंधन में नहीं फँसेगा। मतलब भी यहाँ पे अर्जुन जी द्वारा थोड़ा थ्योरेटिकल, थ्योरेटिकल क्या है? तात्विक जो है, सारा चर्चा समझ रहे हैं, तो भी प्रैक्टिकल, व्यावहारिक चर्चा आपके लिए भगवान, अर्जुन, तुम युद्ध करना पड़ेगा, अगर तुम युद्ध कर रहे हो, अगर तुम अहंकार का भाव नहीं है, अगर तुम युद्ध कर नहीं है।
त्रिधा कर्मसंग्रहः कर्म कर्ता कर्म च चोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः॥
तो अभी जो छह थे पिछले श्लोक में, उन छह को भगवान ने भी तीन कर दिया—ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधा कर्मसंग्रहः। यह तीन जो है, तो अभी पिछले श्लोक में छह क्या थे? ज्ञानं, ज्ञानं और परिज्ञाता और यहाँ पे कर्ता, कर्म और कर्म। तो अभी क्या है, व्यक्ति तो एक ही है, इसलिए कर्ता और परिज्ञाता एक हो गया, तो छह का पाँच हो गया, ठीक है। छह का पाँच हो गया, कर्ता और परिज्ञाता एक है।
फिर उसके बाद में यहाँ पे ज्ञानं, कर्मः च कर्ता च हो गया, ज्ञानं ज्ञेय… जो ज्ञान करने के मेरे कर्म करते समय, मेरे कर्म करते समय ज्ञान को मैं परिवर्तित नहीं कर सकता, जो मैं आधार करता भी है उसमें ज्ञान वैसे ही रहने वाला, क्षत्रिय है उसको युद्ध करना है, तो उसका कर्म-भूम् जो है, वो राजसिक है, उसको परिवर्तित नहीं कर सकता। तो इसलिए उभह वो हमारे हाथ में नहीं है।
अभी ये सब विश्लेषण क्यों हो रहा है? कि हम सत्वगुण में कैसे कार्य कर सकते हैं, वो उसके लिए भगवान साथ विश्लेषण कर रहा है। इसलिए ज्ञेय को भगवान निकाल देते हैं। तो ज्ञेय को निकाल देते हैं, तो क्या रहता है? ज्ञान रहता है।
तो अभी क्या हो गया? परिज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय, तो परिज्ञाता और कर्ता एक हो गया था, परिज्ञाता निकाल दे, फिर ज्ञेय क्या है? करणं कर्म करतेति अध्यात्म का एक अध्यात्मिक भाव है, एक अध्यात्मिक स्वभाव है, एक अध्यात्मिक रोती है, वही विभारित हुई है सर्वभूतेषु में, तो क्या है? प्रज्ञानं विद्धि सात्विकम्, तो ही ब्रह्म का साक्षात्कार है सत्वगुण में, हम अध्यात्मिक… प्रज्ञानं विद्धि सात्विकम्, तो जो ज्ञान भौतिक स्तर पर ही रहता है, वहाँ राजसिक ज्ञान है, उसका वर्णन भी अगले श्लोक में आएगा:
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहेतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥
तत् तामसमुदाहृतम्। तामस का क्या है? तु कृत्स्नवदेकस्मिन्, एक ज्ञान के एक विभाग को रहना और उसको कृष्णवद, उसको सबको बोल देना कि यही सब कुछ है, कार्य सत्तम और उससे बहुत आसक्त हो जाता है। अहेतुकम्, अहेतुकम् मतलब यहाँ पर क्या है? कि वास्तव में पूरी तरह से विचार नहीं किया व्यक्ति, वो क्या क्या हेतु है, किस तरह समझ है, वो समझ भी नहीं आता है। अतत्त्वार्थवदल्पम्, समझ भी नहीं आता है और अल्प है, वो ऐसा जो ज्ञान है, वह तामसिक है।
तो आजकल क्या है? नहीं, हिंसा… अनैपेहिघसे छपाभीवारूकर्वाण… आनेही गुर्श estate अनैपेहिघसे छपाभीवारूकर्वाण… फिर मोहदारबिते व्यक्ति मोह में रहता है। यह व्यक्ति शराबी होता है, शराब पीता है, तो उसको बहुत बार अलूब है व्यक्ति शराब पीने से सेहत खराब होती है, पैसा खर्च होता है, मैं पागली से बात करता हूँ, फिर भी क्या होता है? तब वो मोहदारबिते, व्यक्ति मोह के वश में आता है, वैसे ही कार्य कर देता है।
तामसिक कार्य के लक्षण हैं ये सब लक्षणें की व्यक्ति पूरी तरह से देखते हैं, क्या है अंतरंग चेतना क्या है? मोह है। आंतरिक बुद्धि के साथ विचार नहीं कर रहा है और बाहर उससे प्रभाव क्या होता है? वो दूसरों का नाश करता है, चीज़ों का विनाश करता है। तो यह इस प्रकार का कर्म है, यह तामसिक कर्म है, विचार नहीं कर रहा है।
तो कर्म का हो गया, अब ये तीन प्रकार के कर्ता के बारे में भगवान बताएंगे:
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी—जो व्यक्ति संग से मुक्त रहता है और अहंकार से मुक्त है, यहाँ महत्वपूर्ण है। धृत्युत्साहसमन्वितः—धृति मतलब कि determination, उत्साह मतलब enthusiasm, समन्वितः। धृति उत्साह समन्वितः—धृति मतलब कि determination, उत्साह मतलब enthusiasm, समन्वितः।
रागी कर्मफलप्रेप्सुलुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥
रागी, आसक्त, फल से फिर कर्मफलप्रेप्शु, लुब्धो, हिंसात्मक, अशुचि, हिंसा करता है, थोड़ा सा प्रयास के कुछ फल नहीं मिला, तो पूरा अवधान जाता है व्यक्ति, और फल मिल गया तो क्या पंद्रह धर्मानोसी लगता है व्यक्ति, तो क्या ये बहुत ही मतलब क्या रजोगुण में होता है, तो व्यक्ति बाहरी चीज़ों से बहुत प्रभावित होता है, व्यक्ति बाहरी चीज़ों से बहुत प्रभावित होता है…
अयुकः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥
अयुक्तः, प्राकृतः, स्तब्धः—स्तब्धः, आत्मसंभाविताः, स्तब्धः, आत्मसंभाविताः, स्तब्धः…